वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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के लिये शाल-दुशाले हैं, न बिजलीके पट्टे हैं, न भाङ-फानूस या बिजलीकी रोशनी है और न भुगनयनी, मोहिनी कामिनी ही हैं ; तोभी वे ज़मीनको ही अपना पलंग, हाथको ही तकिया, शीतल हवाको ही पट्टा, चन्द्रमाको ही दीपक और संसारी विषय-भोगोंसे विरक्ति को ही अपनी स्त्री मान कर सुखसे सोते हैं। राजा-महाराजा और अमीर-उमरा बहिया-बहिया पलंग, क्रन्दहारी कालीन, मखमली गह-तकिये, बिजलीके पंखे और रोशनी तथा सुन्दरी स्त्रियोंके साथ जो मिथ्या सुख उपभोग करते हैं, उससे लाख दर्जन उत्तम और सच्चा सुख मुनि लोग ज़मीन और अपनी भुजा, अनुकूल हवा, चन्द्रमा तथा अपनी विरक्ति रूपिणी स्त्रीके साथ उपभोग करते हैं। अब बुद्धिमानोंको विचार करना चाहिये, कि उन दोनोंमें बुद्धिमान कौन है और वास्तविक सुख किसे मिलता है। अमीरोंको सुखके लिये कितने भङ्गभट करने पड़ते हैं और कितनी आफूतें उठानी पड़ती हैं ; तथापि उन्हें सच्चा सुख नहीं मिलता और मुनि लोग बिना भङ्गभट, बिना आफूत और बिना प्रयासके सच्चा सुख भोगते और शान्तिकी नींद सोते हैं।
छप्पय ।
पृथ्वी परम पुनीत, पलंग ताकी मन मान्यौ ।
तकिया अपनो हाथ, भुगनको तम्बू तान्यो ॥
पुनीत=पवित्र। भुगन=आस्मान। चन्द-चिराग=चन्द्रमा-चिराग