वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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जब तक मनुष्यको ब्रह्मज्ञान नहीं होता, जबतक उसे आत्म-ज्ञान नहीं होता, जब तक उसे उस सुखका खाद नहीं मिलता, तभी तक मनुष्य संसारी-विषय-भोगोंमें सुख समझता है। जब मनुष्यको उस सर्वोत्तम—सदा स्थिर रहनेवाले सुखका स्वाद मिल जाता है, तब वह संसारी आनन्द या दुनियाबी मज़े तो क्या—त्रिभुवनके राजसुखको भी कोई चीज़ नहीं समझता। मतलब यह है कि, सच्चा और वास्तविक सुख ब्रह्म-ज्ञान या आत्मज्ञानमें है। उसके बराबर आनन्द त्रिलोकीके और किसी भी पदार्थमें नहीं है। जो संसारी पदार्थोंमें सुख मानते हैं, वे अज्ञानी और नासमझ हैं। उनमें अच्छे और बुरे, असल और नक़लके पहचाननेकी तमीज़ नहीं। वे रस्तीको सौप और मुगमरीविकाको जल समझनेवालोंकी तरह भ्रममें डूबे या बहँके हुए हैं।
सोरठा ।
कहा विषयको भोग, परम भोग इक और है।
जाके हात संयोग, नीरस लागत इन्द्रपद ॥ ८० ॥
80. If you have realised the great One in whose presence the kingdom of the three worlds appears to give no pleasure, you should not cherish any longing for the acquirement of enjoyments such as those of good seats, clothes and honour. There is an Enjoyment somewhere, Great and Eternal, by tasting which all pleasures like that of the