भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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kingdom of the three worlds become tasteless or lose fascination.

किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रैर्वाहविस्तैः

स्वर्गप्राप्तकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविश्रमैः ॥

मुक्तवैकं भवन्वन्दुःखरचनाविध्वंसकालानलं

स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषा वणिगृत्तयः ॥८१॥

वेद, स्मृति, पुराण और बड़े-बड़े शास्त्रोंके पढ़ने तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके कर्मकाण्ड करनेसे स्वर्गमें एक कुटियाकी जगह प्राप्त करनेके सिवा और क्या लाभ है ? ब्रह्मानन्दरूपी गद्दीमें प्रवेश करनेकी चेष्टाके सिवा, जो संसार-बन्धनोंके काटनेमें प्रलयाग्निके समान है, और सब काम व्यापारियोंके से काम हैं ॥८१॥

वेद, स्मृति, पुराण और बड़े-बड़े शास्त्रोंके पढ़ने-सुनने और उनके अनुसार कर्म करनेसे मनुष्यको कोई बड़ा लाभ नहीं है। अगर ये कर्मकाण्ड ठीक तरहसे पार पड़ जाते हैं, तो इनसे इतना ही होता है, कि स्वर्गमें एक कुटीके लायक स्थान मिल जाता है, पर वह स्थान भी सदा कृत्रुमें नहीं रहता ; जिस दिन पुण्यकर्मोंका ओर आ जाता है, उस दिने वह स्वर्गीय स्थान फिर छिन जाता है ; इससे प्राणीको फिर दुःख होता है। मतलब यह हुआ, कि कर्मकाण्डोंसे जो सुख मिलता है, वह सुख नित्य या सदा-सर्वदा रहने वाला