वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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नहीं; उस सुखके अन्तमें फिर दुःख होता है—फिर स्वर्ग छोड़ कर मृत्युलोकमें जन्म लेना पड़ता है—वही जन्म-मरण के दुःख झेलने पड़ते हैं। इस लिये मनुष्योंको ब्रह्मज्ञानी होनेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्मज्ञान रूपी अग्नि प्रलयशक्तिके समान है। वह अग्नि संसार-बन्धनोंको जड़ से जला देती है; अतः फिर सदा सुख रहता है—दुःखका नाम भी सुननेको नहीं मिलता। इसलिये ज्ञानियोंने ब्रह्म-ज्ञान—आत्मज्ञानको सर्वोपरि सुख दिलाने वाला माना है। मतलब यह है, कि बिना ब्रह्मज्ञान या रामभक्तिके सब जप-तप आदि वृथा है। सारे वेद शास्त्रों और पुराणोंका यही निबोड़ है कि, ब्रह्म सत्य और जगत् मिथ्या है तथा जीव ब्रह्मरूप है। जो इस तत्त्वको जानता है वही सन्न्वा पण्डित है। जो ब्रह्म या आत्माको नहीं जानता, वह अज्ञानी और मूर्ख है। उसका पढ़ना-लिखना वृथा समय नष्ट करना है।
तुलसीदासजीने कहा है:—
चतुरार्द्र चूलहे परौ, यम गहि ज्ञानहि खाय ।
तुलसी प्रेम न रामपद, सब जसमूल नशाय ॥
महादेवजी पार्वतीजीसे कहते हैं:—
ये नराधम लोकेषु, रामभक्ति पराड्मुख्याः ॥
जपं तपं दयाशौचं, श्रवन्नाणां श्रवणाहनम् ॥
सर्वं वृथा चिन्ता येन, शृणुत्वं पार्वति प्रिये ! ॥