भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २७२ )

हे प्रिये ! जो नराधम इस लोकमें रामकी भक्तिसे विमुक्त हैं, उनके जप, तप, दया, शौच, शास्त्रोंका पठन-पाठन—ये सब वृथा हैं। असल तत्व भगवान्की निष्काम भक्ति या ब्रह्ममें लीन होना है ।

छप्पय ।

श्रुति अरु स्मृति, पुरान पढ़े विस्तार सहित जिन । साधे सब युष्कर्म, स्वर्गको बात लखौं तिन ॥ करत तहाँ हूँ चाल, कालको ख्याल भयंकर । बसा और सुरेश, सबनको जन्म मरण डर । ये बगिचबूति देखी सकल, अन्त नहीं कहु कामकी ।

अद्वैत बसको ज्ञान, यह एक ठौर चाराम की ॥८१॥

81. What is the use of reading the Vedas, the Smritis, the Purans and the voluminous Shastras or of practising the various Karamkanda actions which are fruitful only in procuring an abode in a cottage in Swarga? All other pursuits are mercenary save that of trying to enter the citadel of self-realisation which is like the Pralaya fire in putting an end to the misery of the bondages of this world.

श्रुति=वेद । स्मृति=धर्म शास्त्र; मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति वगैर । पुरान=पुराण, पुरातन इतिहास ; जिसमें प्राचीन इतिहासके भिषसे धर्मके तत्व निरूपण किये गये हों । भागवत, विष्णु पुराण और शिव पुराण आदि । डरेश=इन्द्र । अद्वैत=द्वैत रहित, एक, भेद रहित, जिसके समान दूसरा नहीं । शंकराचार्यका मत अद्वैत है ; उन्होंने जीव और ईश्वरको एक माना है ।