वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७३ )
आयुः कलोलोलं कतिपयदिवसस्थायिनी यौवन श्री-
रथाः संकल्पकल्पा घनसमयतद्विद्विभ्रा भोगपूराः ॥
कण्ठारलेषोपगृहं तद्विपि च न चिरं यत्पियामिः प्रणीतं
ब्रह्मण्यासक्तचित्ता भवत भवभयाम्मोधिपारं तरीतुम् ॥८२॥
आयु—उग्र—पानीकी लहरोंके समान चञ्चल है, जवानी थोड़े दिनोंकी है, घन मनके संकल्पोंसे भी कम देर ठहरनेवाला है भोग वर्षाकालमें चमकनेवाली बिजलीकी चमकसे भी अधिक चञ्चल है, प्यारी स्त्रीका गलेसे लगाना भी चिरस्थायी नहीं है। इस लिए मनुष्यो ! भवसागरसे पार होनेके लिए ब्रह्ममें लीन होओ ॥८२॥
आयु की चंचलता ।
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प्राणीकी आयुका कोई ठिकाना नहीं। यह जलकी तरङ्गोंके समान चञ्चल और पानीके बुलबुलेके समान क्षणस्थायी है। यह अभी है और अगले क्षण न रहे। जो साँस बाहर जाता है, वह वापस आवे और न आवे। इधर प्राणी जन्म लेता है और उधर मौत उसके पीछे लगती है। ऐसे क्षणभंगुर जीवनपर क्या खुशी मनायी जाय ? “मोहमुद्गर” में कहा है—
नलिनीदलगतजलमतितरलं, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
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