वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७४ )
विदि व्याधिग्यालयस्तं, लोकं शोकहतन्व समस्तम् ॥
पश्चपत्र पर पड़ा हुआ जल अतीव चञ्चल होता है, मनुष्य का जीवन भी उसी तरह अतीव चञ्चल है। यह सारा संसार रोग-रूपी सर्पासे श्रलित हो रहा है। इसमें दुःख-ही-दुःख है।
जवानी ।
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जिस तरह मनुष्यकी आयु पानीकी लहरोंके समान चञ्चल और सदा-सर्वदा रहने वाली नहीं है; उसी तरह जवानी भी चन्द्रोत्क्रा या अल्पकालस्थायी है। सदा कोई जवान नहीं रहा। अवस्थायें बदलती ही रहती हैं। बचपन के बाद जवानी और जवानीके बाद बुढ़ाप्रा आता है और अवश्य आता है। चार दिनोंको चाँदनों, फेर अँधेरी रात वाली बात है। किसीने कहा है:—
सदा न फूलै तोरईं, सदा न सावन होय ।
सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवे कोय ॥
सदा तोरईं नहीं फूलती, सदा सावन नहीं रहता, सदा जवानी नहीं रहती और सदा कोई जीता भी नहीं रहता। और भी कहा है:—