वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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रहती है कब, व्हारे जवानी तभाम उग्र, मानिन्द वूये गुल, इधर आई उधर गई ।
यौवन अवस्था को बहार उग्र-भर थोड़े ही रहती है। यह तो फूलकी सुगन्धकी तरह इधर आई, उधर गई।
जो आज जवानीके नशेमँ मतवाले हो रहे हैं, जो मल-मल कर और साबुन लगा-लगा कर अपनी मिट्टीकी कायाको धोते और उसे चन्दन कपूर एवं इत्र-फुलेलॉसे सुगन्धित करते एवं भाँति-भाँतिके गहने पहने रहते हैं, स्त्रियाँ जो अपनी दोनों छातियोंको ऊँची उठा कर चलती हैं और पुरुष जो मूछोंपर बल और तांच देते हैं, वे होश करे और मनमँ निश्चय समझले कि, उनका यह शरीर सदा उनके साथ न रहेगा, एक दिन यहाँ-का-यहाँ ही बड़ा रह जायगा और मिट्टीमें मिल जायगा। कायाके नाश होनेके पहले ही बुढ़ावस्था युवावस्थाको निगल जायगी। जो दाँत आज मोंतियों की तरह चमकते हैं, वे कल हिल-हिल कर आपका दम नाक में कर देंगे और एक-एक करके आपका साथ छोड़ देंगे। उस समय आपका मुख पोपठा और भड़ा हो जायगा। जिन बालों को आप रोज धोते और साफ रखते हैं तथा जिनकी सजावट आप तरह-तरहसे करते हैं, वे एक दिन सफेद या सनकी तरह हो जायेंगे। ये फूले हुए गाल पिचक जायेंगे। आँखों में यह रसोलापन न रहेगा। इनमें पीलापन और पुम्ब छा जायगा। आज की सी अकड़-तकड़ न रहेगी, छाड़ीके