वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 379, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७६ )
सहारे चलोगे और वह भी काँपने लगेगी । जो लोग आज आपको देखकर खुश होते हैं, आपका आदर करते हैं, वे ही आपका अनादर करेंगे, आपकी बात भी न पूछेंगे, यह तो आप की काया और जवानीका हाल है, अब अपने धन-दोलत की चञ्चलताकी बातें भी सुनिये ।
लक्ष्मी चञ्चल है ।
—oo—oo—oo—
लक्ष्मीको चञ्चला और चपला भी कहते हैं । लक्ष्मी ठीक उस चपला की तरह है, क्षणमें चमकती और क्षण भरमें ही बादलोंमें बिलाय जाती है । अनेकोंने इस धनको मनके विचारोंकी तरह क्षणस्थायी और बेजड़ कहा है । यह धन किसीके पास सदा नहीं रहा । तीन पीढ़ीसे अधिक तो एक परिवारमें धन रहते किसी ने देखा ही नहीं । आज जो धनी है, कल वही निर्धन हो जाता है । आज जो हज़ारों को भोजन देता है, कल वही अपने भोजनके लिये औरोंके द्वारपर भटकता फिरता है । आज जो राजा है, कल वही रंक हो जाता है । आज जो बिना मोटर और जोड़ीके एक कदम चल नहीं सकता, कल वही पैदल दौड़ा फिरता है । आज जिसकी आज़ा-पालनके लिये हज़ारों दास-दासी खड़े रहते हैं, कल वही दूसरोंकी आज़ा पालनके लिये खड़ा देखा जाता है । सारांश यह कि, धन-वैभव न तो सदा