वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २७७ )
किसीके पास रहा हो और न आगे ही रहेगा। इसोलिये धन को भी चञ्चल कहा है। नीतिमें लिखा है:—
यौवनं जीवितं चित्तं द्वायालक्ष्मीश्च स्वामिता ।
चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥
यौवन, जीवन, मन, शरीरकी छाया, धन और स्वामिता—ये छहों चञ्चल हैं, यानी स्थिर होकर नहीं रहते।
मूर्ख हैं वे, जो इस कूड़े और सदा न रहनेवाले धन पर फूँकते और घमण्ड करते हैं। वे समझते हैं कि, यह हमारे पास सदा रहेगा; पर यह उनकी भारी भूल है। धनको सदा बिजलीकी चमक और बादलकी छायाकी तरह क्षणस्थायी और चंचल समझ कर असिमान न करना चाहिये। “मोहमुद्गर” में कहा है:—
मा कुरु धनजन यौवन गर्वं
हरति निमेषात् कालः सर्वं,
मायामयमिदमखिलं हित्वा,
ब्रह्मपदं प्रविशाशु विदित्वा ॥
इस धन-यौवनका गर्व न कर, काल इसको पटक मारते हुए लेता है। इस मायामय झंसारको त्यागकर, शोघ ही ब्रह्मपद में प्रविष्ट हो।