भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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स्त्रीका आर्लिंगन भी चिरस्थायी नहीं है।

जिस तरह आयु, यौवन और धन चंचल है ; उसी तरह नारी भी चंचल है। आज जो अपनी है, उसे कल परायी होते देर नहीं लगती। आज जो रमणियोंके साथ आनन्द करते हैं, कल वे ही उनके बियोगमें तड़पते देखे जाते हैं। कहते हैं कि स्त्री करवट बदलते पराई हो जाती है। कहा है—

शास्त्रं सुचिन्तितमथो परिचिन्तनीयम् ।

आराधितोऽपि नृपतिः परिशंकनीयः ।

अंकेश्चिन्तयिष्यते युवतिः परिरक्षणीयः ।

शास्त्रे नृपे च युवतो च कुतो वशित्वम् ?

बूब याद किये हुए शास्त्रको भी बार-बार फेरना चाहिये, बूब सेवा किये हुए राजासे भी डरना चाहिये, गोदमें पड़ी स्त्रीकी सावधानीसे रक्षा करनी चाहिये ; क्योंकि शास्त्र, राजा और युवती इनका विश्वास नहीं।

“क्षीणां विश्वासे नैव कर्तव्यः”

स्त्रियोंका विश्वास नहीं करना चाहिये, ऐसे-ऐसे वाक्य जगह-जगह मिलते हैं। महाराजा भर्तृहरि को ही लीजिये। महाराजामें क्या बुद्धि थी ? क्या उनमें बलवीर्य, रूप, विद्या चातुरी प्रभृति किसी भी गुणकी कमी थी ? क्या उनके यहाँ