भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २७६ )

सुख-भोगके सामानों की कमी थी ? नहीं, कुछ भी नहीं । सब कुछ था ; पर पिंगला ने महाराजाको छोड़, घोड़ोंके दारोगासे दिल लगाया । फिर ; स्त्रियोंकी प्रीतिको सदा रहने वाली कैसे कह सकते हैं ?

एक स्त्रीकी दूगावाजी ।

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एक साहूकारने अपने लड़केको नाराज़ होकर घरसे निकाल दिया । चलते समय उसने अपनी स्त्रीसे कहा—“तुझे मैं तेरे पीहर पहुँचाता जाऊँ, क्योंकि वनमें बड़े कष्ट हैं और अभी रोज़गारका ठिकाना नहीं । ईश्वर जाने क्या-क्या कष्ट उठाने होंगे ।” स्त्रीने कहा—“स्वामिन् मैं आपके बिना क्षणभर भी नहीं रह सकती । आपके बियोगके मुक्तावलेमें राह-बाट और वनके कष्ट तुच्छ हैं । मैं आपके साथ चलूँगी और आपकी पदसेवा कर अपने तई धन्य समझूँगी ।” साहूकारके लड़केके बहुत समझाने पर भी जब स्त्री न मानी, तो उसने उसे अपने साथ ले लिया ।

वे दोनों स्त्री-पुरुष घरसे कुछ दूर लेकर चल दिये । रोज़ मंजिलोंपर मंजिले तय करते हुए, एक दिन दोनों, दोपहरके समय, एक फ़कीरके तकिचे पर पहुँचे । वहाँ वृक्षोंकी सघन छाया थी, सामने ही भोड़े फासिलेपर एक कुआँ था । साहूकारका लड़का लोटा डोर ले जल लाने गया और स्त्री