भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

( २८० )

वहीं बैठो रही । फ़कीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है; अतः उससे कहा—“तु मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूपमें धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़कीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । उ्यों ही उसका पति खोटा : खींचनेको भुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़कीरके साथ होली । फ़कीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे यौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी ताळीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।

उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालब थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने उ्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तु कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । झापाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।