वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २८१ )
बनजारने उसकी चिकित्सा कराकर उसे गरम कपड़ोंमें सुला दिया। चन्द्रोज्ञमें वह बनजारा भी उसी नगरमें पहुँचा। साहूकारका लड़का रोज़गारकी तलाशमें घूमता रहा। ईश्वर-कृपासे एक बड़े सेठने उसे अपने यहाँ रख लिया। लड़का बड़ा ही वलता-पुरज़ा निकला, इसलिये उस सेठने उसे अपना प्रधान मुनीम बना लिया।
उन्हीं दिनों उस वेश्याकी बड़ी तारीफ़ सुन, राजाने अपने यहाँ उसके नाचका हुक्म दिया। महफ़िल सज़ाई गई, चारों ओर नगरके सेठ-साहूकार, रईस-अमीर बैठे। राजा सिंहासनपर बैठा। वेश्या नाचने लगी। उसके रूप और नाच-गान पर महफ़िलकी महफ़िल मुग्ध हो गई। इतनेमें उस वेश्याकी नज़र उस साहूकारके लड़के या अपने पतिपर पड़ गई। राजाने प्रसन्न होकर कहा, “बोबो! तुम माँगो, वही इनाम मिलेगा।” वेश्याने कहा—“महाराज! यदि आप मुझे इनाम देनेका बचन देते हैं, तो यह बचन दीजिये, कि मैं जो माँगूँ वही मिले।” जब राजा बचन-बद्ध हो गया था, तब वेश्याने कहा—राजन्! वह सामने बैठा हुआ पुरुष मेरा चोर है, उसे मरवा दीजिये।” जब राजाने उसके मारे जानेकी आज्ञा दे दी, तब साहूकारके लड़केने कहा—“इसके पास मेरी कुछ धरोहर है; इससे कहिये कि, यह हाथमें जल ले मुझे उसे कल्प कर के दे दे।” वेश्याने कहा—“मुप! तेरा मुझे क्या देना है? खौर, ले; मैं जल लेकर संकल्प करके कहती हूँ, कि जो कुछ