वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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वहीं बैठो रही । फ़क़ीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है ; अतः उससे कहा—“तू मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूप़में धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़क़ीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । ज्यों ही उसका पति छोटा ; खींचनेको झुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़क़ीरके साथ होली । फ़क़ीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे मौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी तालीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था ; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।
उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालध थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने ज्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तू कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । क़पाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।