भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( २७६ )

सुख-भोगके सामानों की कमी थी ? नहीं, कुछ भी नहीं । सब कुछ था ; पर पिंगला ने महाराजाको छोड़, घोड़ोंके दारोगासे दिल लगाया । फिर ; स्त्रियोंकी प्रीतिको सदा रहने वाली कैसे कह सकते हैं ?

एक स्त्रीकी दूगावाजी ।

—oooo—

एक साहूकारने अपने लड़केको नाराज़ होकर घरसे निकाल दिया । चलते समय उसने अपनी स्त्रीसे कहा—“तुझे मैं तेरे पीहर पहुँचाता जाऊँ, क्योंकि वनमें बड़े कष्ट हैं और अभी रोज़गारका ठिकाना नहीं । ईश्वर जाने क्या-क्या कष्ट उठाने होंगे ।” स्त्रीने कहा—“स्वामिन् मैं आपके बिना क्षणभर भी नहीं रह सकती । आपके बियोगके मुक्तावलेमें राह-बाट और वनके कष्ट तुच्छ हैं । मैं आपके साथ चलूँगी और आपकी पदसेवा कर अपने तई धन्य समझूँगी ।” साहूकारके लड़केके बहुत समझाने पर भी जब स्त्री न मानी, तो उसने उसे अपने साथ ले लिया ।

वे दोनों स्त्री-पुरुष घरसे कुछ दूर लेकर चल दिये । रोज़ मंजिलोंपर मंजिले तय करते हुए, एक दिन दोनों, दोपहरके समय, एक फ़कीरके तकिचे पर पहुँचे । वहाँ वृक्षोंकी सघन छाया थी, सामने ही भोड़े फासिलेपर एक कुआँ था । साहूकारका लड़का लोटा डोर ले जल लाने गया और स्त्री

( २८० )

वहीं बैठो रही । फ़कीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है; अतः उससे कहा—“तु मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूपमें धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़कीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । उ्यों ही उसका पति खोटा : खींचनेको भुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़कीरके साथ होली । फ़कीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे यौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी ताळीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।

उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालब थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने उ्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तु कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । झापाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।

( २८१ )

बनजारने उसकी चिकित्सा कराकर उसे गरम कपड़ोंमें सुला दिया। चन्द्रोज्ञमें वह बनजारा भी उसी नगरमें पहुँचा। साहूकारका लड़का रोज़गारकी तलाशमें घूमता रहा। ईश्वर-कृपासे एक बड़े सेठने उसे अपने यहाँ रख लिया। लड़का बड़ा ही वलता-पुरज़ा निकला, इसलिये उस सेठने उसे अपना प्रधान मुनीम बना लिया।

उन्हीं दिनों उस वेश्याकी बड़ी तारीफ़ सुन, राजाने अपने यहाँ उसके नाचका हुक्म दिया। महफ़िल सज़ाई गई, चारों ओर नगरके सेठ-साहूकार, रईस-अमीर बैठे। राजा सिंहासनपर बैठा। वेश्या नाचने लगी। उसके रूप और नाच-गान पर महफ़िलकी महफ़िल मुग्ध हो गई। इतनेमें उस वेश्याकी नज़र उस साहूकारके लड़के या अपने पतिपर पड़ गई। राजाने प्रसन्न होकर कहा, “बोबो! तुम माँगो, वही इनाम मिलेगा।” वेश्याने कहा—“महाराज! यदि आप मुझे इनाम देनेका बचन देते हैं, तो यह बचन दीजिये, कि मैं जो माँगूँ वही मिले।” जब राजा बचन-बद्ध हो गया था, तब वेश्याने कहा—राजन्! वह सामने बैठा हुआ पुरुष मेरा चोर है, उसे मरवा दीजिये।” जब राजाने उसके मारे जानेकी आज्ञा दे दी, तब साहूकारके लड़केने कहा—“इसके पास मेरी कुछ धरोहर है; इससे कहिये कि, यह हाथमें जल ले मुझे उसे कल्प कर के दे दे।” वेश्याने कहा—“मुप! तेरा मुझे क्या देना है? खौर, ले; मैं जल लेकर संकल्प करके कहती हूँ, कि जो कुछ

( २८० )

वहीं बैठो रही । फ़क़ीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है ; अतः उससे कहा—“तू मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूप़में धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़क़ीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । ज्यों ही उसका पति छोटा ; खींचनेको झुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़क़ीरके साथ होली । फ़क़ीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे मौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी तालीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था ; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।

उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालध थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने ज्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तू कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । क़पाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।

( २८१ )

बनजारने उसकी चिकित्सा कराकर उसे गरम कपड़ोंमें सुटा दिया। चन्द्रगुप्तमें वह बनजारा भी उसी नगरमें पहुँचा। साहूकारका लड़का रोजगारकी तलाशमें घूमता रहा। ईश्वर-कृपासे एक बड़े सेठने उसे अपने यहाँ रख लिया। लड़का बड़ा ही वलता-पुरज़ा निकला, इसलिये उस सेठने उसे अपना प्रधान मुनीम बना लिया।

उन्हीं दिनों उस वेश्याकी बड़ी तारीफ सुन, राजाने अपने यहाँ उसके नाचका हुकम दिया। महफिल सज़ाई गई, चारों ओर नगरके सेठ-साहूकार, रईस-अमीर बैठे। राजा सिंहासनपर बैठा। वेश्या नाचने लगी। उसके रूप और नाच-गान पर महफिलकी महफिल मुग्ध हो गई। इतनेमें उस वेश्याकी नज़र उस साहूकारके लड़के या अपने पतिपर पड़ गई। राजाने प्रसन्न होकर कहा, “बोबो! तुम माँगो, वही इनाम मिलेगा।” वेश्याने कहा—“प्रहाराज! यदि आप मुझे इनाम देनेका बचन देते हैं, तो यह बचन स्वीजिये, कि मैं जो माँगूँ वही मिले।” जब राजा बचन-बद्ध हो गया था, तब वेश्याने कहा—राजन्! वह सामने बैठा हुआ पुरुष मेरा चोर है, उसे मरवा स्वीजिये।” जब राजाने उसके मारे जानेकी आज्ञा दे दी, तब साहूकारके लड़केने कहा—“इसके पास मेरी कुछ धरोहर है; इससे कहिये कि, यह हाथमें जल ले मुझे उसे कल्प कर के दे दे।” वेश्याने कहा—“मुए! तेरा मुझे क्या देना है? खौर, ले; मैं जल लेकर संकल्प करके कहती हूँ, कि जो कुछ

( २८२ )

तेरा मेरे पास हो तू ले।" वेश्याके संकल्प छोड़ते ही वह ज़मीनपर गिर पड़ी और मर गई। राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उसने उस लड़केसे इस घटनाका असली तत्व पूछा। लड़केने कहा—"राजन् ! यह मेरी न्याहता स्त्री है। मैं और यह घरसे निकल आये। राहमें इसे साँपने काटा, और यह मर गई, मैं भी इसीके साथ जलनेको तैयार हुआ। इतनेमें महादेव-पार्वती उधर आ निकले। पहले तो उन्होंने कहा—"अरे पागल ! स्त्रीके लिये जान देता है ! तू है तो और बहुत स्त्रियाँ मिल जायेंगी। पर मैं उनकी बातपर राजी न हुआ, तब उन्होंने कहा—"तू हाथमें जल लेकर अपनी आधी आयु इसे दे, तो यह जी सकती है। फिर भी, जब कभी तू अपनी शेष बची आयु इससे माँगोगा और यह संकल्प छोड़ देगी, तब यह मर जायगी। महाराजा मुझे यह प्राणांसे भी प्यारी थी ; अतः मैंने अपनी आधी आयु इसे देदी। इसके बाद यह मुझे कूपमें धकेल फ़कीरके साथ बड़ी आई और वेश्या हो गई। आज यह मुझे जानसे मरवाने पर ही तुल गई। स्त्री-जातिकी प्रीतिका ज़रा भी विश्वास नहीं।" राजा उससे बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना प्रधान मन्त्री बना लिया।

इस कहानीसे हमने स्त्रियोंकी प्रीतिका नमूना दिखाया है। निश्चय ही सभी स्त्रियाँ ऐसी नहीं होतीं ; पर इसमें शक नहीं कि, अधिकांश ऐसी ही होती हैं ; अतः स्त्री की

( २८३ )

प्रीतिका आनन्द सदा नहीं मिल सकता। मान लो, स्त्री पतिव्रता भी हो, तो सम्भव है कि, वह पहले ही मर जाय।

इस तरह भी वियोग हो सकता है।

सारगंश यह कि, आयु, यौवन, धन और नारी—ये सभी चंचल, अनित्य और क्षणभंगुर हैं। इसीलिये परिणाममें दुःखोंके भाण्डार हैं। अतएव बुद्धिमानोंको चाहिये, कि ब्रह्ममें चित्त लगायें, रात दिन उसीका ध्यान—उसीका चिन्तना करें। उससे वे भवसागरके पार हो जायेंगे। उन्हें बारम्बार जन्म-मरणका कष्ट न होगा—नित्य श्वायो सुख मिलेगा। स्त्री-पुत्र, धन प्रभृतिमें मन लगानेसे सदा दुःख-सागरमें गोते लगाने पड़ते हैं। मर कर फिर जन्म लेना पड़ता है और फिर मरना पड़ता है। अब बुद्धिमान ही विचार करें, कि दोनोंमें कौनसा मार्ग सुखदायी है।

कृपय ।

जलकी तरल तरंग जात, ज्यों जात आयु यह ।

यौवन हूँ दिन चार, चटककी चोंप चाह चह ॥

ज्यों दामिनी प्रकाश, भोग सब जानहु तैसे ।

तैसे ही यह देह अथिर, थिर हवै है कैसे ॥

सुनि एरे मेरे चित्त तू, होहि ब्रह्ममें लीन गति ।

संसार अधार समुद्र तर, करि नौका निज ज्ञान रति ॥ ८२ ॥

82. Life is transient like the water-currents, youth is short-lived, riches are foundationless like the flights of the human

( २८२ )

तेरा मेरे पास हो तु ले।" वेश्याके संकल्प छोड़ते ही वह ज़मीनपर गिर पड़ी और मर गई। राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उसने उस लड़केसे इस घटनाका असली तत्व पूछा। लड़केने कहा—"राजन्! यह मेरी न्याहता स्त्री है। मैं और यह घरसे निकल आये। राहमें इसे साँपने काटा, और यह मर गई, मैं भी इसीके साथ जलनेको तैयार हुआ। इतनेमें महादेव-पार्वती उधर आ निकले। पहले तो उन्होंने कहा—"अरे पागल! स्त्रीके लिये जान देता है! तू है तो और बहुत स्त्रियाँ मिल जायेंगी। पर मैं उनकी बातपर राजी न हुआ, तब उन्होंने कहा—"तू हाथमें जल लेकर अपनी आधी आयु इसे दे, तो यह जी सकती है। फिर भी, जब कभी तू अपनी शेष बची आयु इससे माँगैगा और यह संकल्प छोड़ देगी, तब यह मर जायगी। महाराजा मुझे यह प्राणोंसे भी प्यारी थी; अतः मैंने अपनी आधी आयु इसे देदी। इसके बाद यह मुझे कूपमें धकेल फ़कीरके साथ चली आई और वेश्या हो गई। आज यह मुझे जानसे मरवाने पर ही तुल गई। स्त्री-जातिकी प्रीतिका ज़रा भी विश्वास नहीं।" राजा उससे बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना प्रधान मन्त्री बना लिया।

इस कहानीसे हमने स्त्रियोंकी प्रीतिका नमूना दिखाया है। निश्चय ही सभी स्त्रियाँ ऐसी नहीं होतीं; पर इसमें शक नहीं कि, अधिकांश ऐसी ही होतीं हैं; अतः स्त्री की

( २८३ )

प्रीतिका आनन्द सदा नहीं मिल सकता। मान लो, स्त्री पतिव्रता भी हो, तो सम्भव है कि, वह पहले ही मर जाय। इस तरह भी वियोग हो सकता है।

सारगंश यह कि, आयु, यौवन, धन और नारी—ये सभी चंचल, अनित्य और क्षणभंगुर हैं। इसीलिये परिणाममें दुःखोंके भाण्डार हैं। अतएव बुद्धिमानोंको चाहिये, कि ब्रह्ममें चित्त लगायें, रात दिन उसीका ध्यान—उसीका चिन्तना करें। उससे वे भवसागरके पार हो जायेंगे। उन्हें बारम्बार जन्म-मरणका कष्ट न होगा—नित्य स्थायो सुख मिलेगा। स्त्री-पुत्र, धन प्रभृतिमें मन लगानेसे सदा दुःख-सागरमें गते लगाने पड़ते हैं। मर कर फिर जन्म लेना पड़ता है और फिर मरना पड़ता है। अब बुद्धिमान ही विचार करें, कि दोनोंमें कौनसा मार्ग सुखदायी है।

कृप्य ।

जलकी तरल तरंग जात, ज्यों जात आयु यह ।

यौवन हूँ दिन चार, चटककी चोंप चाह चह ॥

ज्यों दार्मिनी प्रकाश, भोग सब जानहु तैसे ।

तैसे ही यह देह अथिर, थिर हूँ है कैसे ॥

सुनि एरे मेरे चित्त तू, होहि ब्रह्ममें लीन गति ।

संसार अपार समुद्र तर, करि नौका निज ज्ञान रति ॥८२॥

82. Life is transient like the water-currents, youth is short-lived, riches are foundationless like the flights of the human

( २८४ )

mind, the objects of pleasure are transitory like the flashes of lightning in the rainy season and the embracing of beloved women also does not last for a long time. O men, it is better for you to fix your heart on Brahma in order to swim across the ocean of worldly fears.

ब्रह्मण्डमण्डलीमात्रं किं लोभाय मनस्विनः ।

शकरीस्फुरितेनात्रैः क्षुब्धता जातु जायते ॥२३॥

जो विचारवान् है, जो ब्रह्मज्ञानी है, उसे संसार लुभा नहीं सकता। मछलीके उछलनेसे समुद्र नहीं उमड़ता ॥२३॥

जिस तरह सफरी मछलीके उछल-कूद मवानेसे समुद्र अपनी गम्भीरता को नहीं छोड़ता, ज़रा भी नहीं उमगता, जैसा का तैसा बना रहता है; उसी तरह विचारवान् ब्रह्मज्ञानी संसारी-पदार्थोंपर लट्ठू नहीं होता वह समुद्रकी तरह गम्भीर ही बना रहता है; अपनी गम्भीरता नहीं छोड़ता। समुद्र जिस तरह मछलीकी उछल-कूदको कुछ नहीं समझता, उसी तरह वह त्रिलोककी की सुख-सम्पत्ति को तुच्छ समझता है। मतलब यह है, कि संसारी विषय-भोग उन्हीं को लुभाते हैं, जो विचारवान् नहीं हैं, जिनमें विचार-शक्ति नहीं है, जिन्हें ब्रह्मज्ञानका आनन्द नहीं मालूम है। उस्ताद ज़ौक कहते हैं:—

दुनिया है वह सग्याद् कि सब दाम में इसके । आ जाते हैं लेकिन कोई दाना नहीं आता ॥

( २८५ )

दुनिया एक ऐसा जाल है, जिसमें प्रायः सभी फँसे हुए हैं। कोई दाना अर्थात् विचारशील पुरुष ही इस जालसे बचा हुआ है।

संसार अन्तः सार-शून्य है, इसमें कुछ नहीं है। यह ठोक आँचलेके समान है, जो ऊपरसे धूल सुन्दर और चिकना-चुपड़ा दोखाता है ; मगर भीतर कुछ नहीं। किसीने संसारको स्वप्नवत् और किसीने इसे कोरा ख़याल ही कहा है ! महा कवि गालिब कहते हैं:—

हस्तीके मत फेरवमें आजाइयो असद ।

आलम तमाम हलक़ ये दामे ख़याल है ॥

गालिब, सृष्टिके चक्रमें मत आ जाना। यह सब प्रपंच तुम्हारे ख़यालके सिवा और कोई चीज़ नहीं है।

इसके जालमें समझदार नहीं फँसते किन्तु नासमझ लोग, जालके किनारोंपर लगी सीपियोंकी चमक-दमक देख कर जालमें आ फँसनेवाली मछलियोंकी तरह, इसके माया-मोहमें फँस कर अनेक प्रकारके कष्ट उठाते हैं ; किन्तु ज्ञानी इसकी अनित्यता, इसकी असारता को देखकर इससे किनारा कर लेते हैं।

दोहा ।

ज्यों सफ़रीको फिरत लख, सागर करत न चोम ।

अगडासे बहागडको, त्यों सन्तनको लोम ॥५३॥

( २८६ )

83 What value has the whole world in the eyes of a man wise in the knowledge of self that he may be tempted by it ! The great Ocean is never disturbed by the jumping of a fish !

यदासीद्विज्ञानं स्मरतिभिरसंस्कारजनितं

तदा दृष्टं नारीभ्यभिदृश्येभ्यं जगदपि ॥

इदानीमस्माकं पट्टरविवेकाञ्जनसुषां

समीभूता दृष्टिस्त्रियसुवनमपि ब्रह्म तद्यते ॥८४॥

जब तक हममें कामदेव से पैदा हुआ अज्ञान-अन्धकार था, तब तक हमें सारा जगत् ब्रह्मरूप ही दीखता था। अब हमने विवेक-रूपी अञ्जन आँज लिया है, इससे हमारी दृष्टि समान हो गई है। अब हमें तीनों भुवन ब्रह्मरूप दिखाई देते हैं ॥८४॥

जब हम काम-मदसे अच्छे हो रहे थे, जब हमें अच्छे-बुरेका ज्ञान नहीं था, तब हमें स्त्री-ही-स्त्री दिखाई देती थी, बिना स्त्री हमें क्षण भर भी कल नहीं थी; किन्तु अब हममें विवेक-बुद्धि आ गई है, अब हम अच्छे-बुरेको समझने लगे हैं, इसलिये अब हमें सारा संसार एकसाँ मालूम होता है। अब हमें कहीं स्त्री नहीं दीखती, सभी तो एकसे दीखते हैं। जहाँ नज़र दोड़ाते हैं, वहीं ब्रह्म ही ब्रह्म नज़र आता है। मतलब यह, कि न कोई स्त्री है न कोई पुरुष, सभी तो एकही हैं; केवल चोलेका भेद है। आत्मा न स्त्री है न पुरुष; वह

( २८७ )

सबमें समान है। मगर अज्ञानियोंको यह बात नहीं दीखती। उन्हें और का और दीखता है।

श्वेताश्वतरोपनिषद्में लिखा है :—

नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः।

यवच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥

यह आत्मा न स्त्री है न पुरुष और न नपुंसक। यह जिस जिस शरीरको धारण करता है, उसी-उसीके साथ जुड़ जाता है।

जब मनुष्यको इस बातका ज्ञान हो जाता है कि, स्त्री और पुरुषमें कोई भेद नहीं, जो मैं हूँ वही स्त्री है—स्त्रीने और तरहका कपड़ा पहन रक्खा है और मैंने और तरहका—तब उसका मन स्त्री पर नहीं भूलता। अपने ही स्वरूपको और समझ कर उससे मैथुन करनेकी इच्छा नहीं होती। ज्ञानी को संसारमें शत्रु, मित्र, स्त्री-पुत्र, स्वामी-सेवक नहीं दीखते। वह स्त्री-पुत्र और शत्रु-मित्र सबको समान समझता है; किसीसे राग और किसीसे द्वेष नहीं रखता। उसे कुत्तेमें आदमीमें, तथा प्राणी मात्रमें ही एक विष्णु दीखता है। यह अवस्था परमपदकी अवस्था है। स्वामी शंकराचार्यायजी कहते हैं :—

शत्रौ मिले पुत्रे वन्धौ ।०

मा कुर यत्नं विग्रहसनन्धौ।

( २८८ )

भव समचितः सर्वत्र त्वं ।

वाक्कृत्यचिराद् यदि विष्णुत्वम् ॥

शत्रु, मित्र और पुत्र-बान्धवोंमें विरोध या मेलके लिये चेष्टा न कर । यदि शीघ्र ही मोक्ष-पथ चाहता है तो शत्रु-मित्र और पुत्र-कलत्र प्रभृतिको एक नज़रसे देख । सबको अपना समर्थ, किसीको गुर न समर्थ ; समान चित्त हो जाय । जैसा ही पुत्र वैसे ही स्त्री, जैसा बेटा वैसा दुश्मन और जैसा धन वैसी मिट्टी ।

एक सच्चा महात्मा ।

✧✧✧

एक साधु सदा ज्ञानोन्मत्त अवस्थामें रहता था । वह कभी किसीसे फाल्गु बातचीत नहीं करता था । एक रोज वह गाँवमें शिक्षा माँगने गया । एक घरसे उसे जो रोटी मिली, उसे वह आप खाने लगा और साथमें कुत्तेको भी खिलाने लगा । यह देख वहाँ अनेक लोग इकट्ठे हो गये और उनमेंसे कोई-कोई उसे पगला कहकर उसकी हँसी करने लगे । यह देख महात्माने उनसे कहा—“तुम क्यों हँसते हो ?”

विष्णुः परिस्थितो विष्णुः

विष्णुः खादति विष्णवे ।

( २८६ )

कथं हससिरे विष्णो ? सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥

विष्णुके पास विष्णु है। विष्णु विष्णुको खिलाता है। अरे विष्णु, तू क्यों हँसता है ? सारा जगत् विष्णुमय है ; यानी सारा संसार उस पूर्णात्मा विष्णुसे व्याप्त है।

सच्चे और पहुँचे हुए साधु-पुरुषों सारे संसारमें एक परमात्माको देखते हैं। उन्हें दूसरा कोई नज़र ही नहीं आता। अज्ञानी लोग जिनके ज्ञान-चक्षु बन्द हैं, जगत्में किसीको अपना और किसीको पराया समझते हैं। किसीने क्या अच्छा उपदेश दिया है :—

एकान्ते सुखमाप्त्यां परतरे चेतः समाधीयताम् ।

पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यां जगदिदं तद्व्यापितं दृश्यताम् ।

प्राक्कर्म प्रविलोप्यतां चित्तबलात्पात्र्युत्तरे श्लिष्यतां ।

प्रारब्धं ति्वह सुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थायिताम् ॥

एकान्त-निर्जन स्थानमें सुखसे बैठना चाहिये। परमब्रह्म परमात्मामें मन लगाना चाहिये। पूर्णात्मा पूर्णब्रह्मसे साक्षात् करना चाहिये और इस जगत्को उस पूर्णब्रह्मसे व्याप्त समझना चाहिये। पूर्वजन्मके कर्मोंको लोप करना चाहिये ; और ज्ञानके प्रभावसे अवके किये कर्मोंके फल त्याग देने चाहिये ; यानी निष्काम कर्म करने चाहिये, जिससे कर्म-बन्धनमें बध्दकर फिर जन्म न लेना पड़े। इस संसारमें प्रारब्ध या पूर्व-

१६

( २६० )

जन्मके कर्मोंको भोगना चाहिये और इसके बाद परमेश्वररूप से इस जगत्में उहरना चाहिये ; यानी अपनेमें और परमात्मामें भेद न समझना चाहिये ।

वेधा

और

समभ

ही पु

वेसी

दोहा ।

काम-अन्ध जवही भयो, तिय देखी सब ठौर ।

अब विवेक-अंजन किये, लख्यौ अलख सिरमौर ॥८४॥

84. As long as we were in the darkness of ignorance produced by lustful passions, the whole universe seemed to us as if transformed into the shape of women. Now that we have applied to our eyes the collyrium of discrimination between right and wrong, our sight has become calm and the three Bhuvans (regions) appear to us to be the manifestation of Brahma.

रम्याश्चन्द्रमरीचयत्तुणवती रम्या वनान्तस्थली

रम्यः साधुसमागमः शमसुखं कान्येषु रम्याः कथाः ।

कोपोपहितबाष्पविन्दुतरलं रम्यं पियाया मुखं

सर्वरम्यमनित्यतामुपगते चितेनकिञ्चित्पुनः ॥८५॥

चन्द्रमाकी किरणों, हरी-हरी वासके तख्ते, मिलोंका समागम

शृंगारभरसकी कवितायें, क्रीडाशुश्रूसे चञ्चल प्यारीका मुख—

काम अन्ध=कामान्ध । कामदेवके मदसे अन्ध। तिय=ही ।

ठौर=जगह । विवेक अन्जन=विवेक या विचारका अन्जन । लख्यौ=देखा । अलख=अगोचर, अदेखा, जो इन्द्रियों द्वारा न जाना जा सके ।

कभी

बह

मिल

खि

कर

हूँ

( २४१ )

पहले ये सब हमारे मनको मोहित करते थे ; किन्तु जबसे संसार की अनित्यता हमारी समझमें आई, तबसे हमें ये सब अच्छे नहीं लगते ॥८५॥

जबतक मनुष्यको संसारकी असांरता, उसकी अनित्यता, उसका थोथापन, उसकी पोछ नहीं मालूम होती, तभी तक मनुष्य संसार और संसारके भगड़ोंमें फँसा रहता है, और विषय-भोगोंको अच्छा समझता है ; किन्तु संसारकी असलियत मालूम होते ही, उसे विषय-सुखोंसे घृणा हो जाती है। उस समय न उसे चन्द्रमाकी शोतल चाँदनी प्यारी लगती है, न मित्रमण्डली अच्छा मालूम होती है, न श्रृङ्गार-रसकी कवितार्यें अच्छी मालूम होती है और न उसका वित्त चन्द्रवदनी कामि-नियोंकी ही देखकर मचलता है।

क्षपय ।

चन्द चाँदनी रम्य, रम्य वनभूमि पहुपयुत । योही अति रमणीक, मित्र मिलवो है अद्भुत ॥ वनिताके मृदु बोल, महारमणीक विराजत । मानिनमुख रमणीक, हगन रैसुअन भर साजत । ए कहे परमरमणीक सब, सब कोज चितमें चहत । इनकाँ विनाश जब देखिये, तब इनमें कछुह न रहत ॥८६॥

चन्द्रचाँदनी=चन्द्रमाकी चाँदनी । रम्य=मनोहर । वनभूमि=जङ्गल

( २६२ )

85. The rays of the moon, the forest glades covered with green grass, the society of friends, the works of literature possessing beauties of composition, the faces of the beloved ones made resplendent by the drops of tears caused by anger, all captivated our heart at first. But since we have realised the destructibility of the world, all these things have lost their attractiveness and our mind is now absolutely vacant,

चेष्टा और समः ही पु वैसी

भिन्नाशी जनमव्यसंगरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा । दानदानविरक्तभार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः ॥ रथ्याच्चीणविशीर्णजीर्णवसैनः संप्रासकन्यासखि- निर्मानो निरहंङ्कतिः शमसुखाभोगैकवद्वस्तुहः ॥८६॥

ऐसा तपस्वी कोई विरला ही होता है, जो भौख मोगकर खाता है, जो अपने लोगोंमें रहकर भी उनमें मोह नहीं रखता, जो स्वाधीनता-पूर्वक अपना जीवन निर्वह करता है, जिसने लेने और देनेका व्यवहार छोड़ दिया है, जो राहमें पड़े हुए चिथड़ोंकी गुदड़ी ओढ़ता है, जिसे मानका ख्याल नहीं है, जिसमें अभिमान नहीं है और जो ब्रह्मज्ञानके सुखको ही सुख मानता है ॥८६॥

ज्ञानीके लक्षण सुन्दरदासजीने इस भाँति कहे हैं—

की-धरती । पुडुपयुत=फूलोंसे छायी हुई । बनिता=झी । सडु=मधुर । बोल=वार्ते । मानिन=मानिनी झी । हगन=आँखोंसे । अघघन भर= आँसुओंकी भड़ी ।

कर्म बह मिर बि ओ क हूं

( २६३ )

कर्म न विकर्म करे, भाव न अभाव घरे । शुभ न अशुभ परे, यातें निधरक है ॥ वस तीन शून्य जाके, पापहु न पुण्य ताके । अधिक न न्यून जाके, स्वर्ग न नरक है ॥ सुख दुःख सम दोज, नीचहुँ न ऊँच कोज । ऐसी विधि रहै सोउ, मिल्थो न फरक है ॥ एकही न दोय जाने, बंध मोक्ष अम मानै । सुन्दर कहत, ज्ञानी ज्ञानमें गरक है ॥

जो भीषण माँगकर पेटकी अग्निको शान्त कर लेता है, पर किसीकी खुशामद नहीं करता, किसीके अधीन नहीं होता, स्वाधीन रहता है ; राहमें पड़े हुए विधदे उठाकर उनकी ही गुदड़ी बना कर ओढ़ लेता है ; मान अपमान और सुख-दुःखको समान समझता है ; न किसीसे कुछ लेता है और न किसीको कुछ देता है ; गृहस्थीमें या अपने बन्धु- बान्धवोंमें रहकर भी उनमें समता नहीं रखता ; शुभाशुभ, याप-पुण्य और स्वर्ग नरकको कोई चीज़ नहीं समझता ; किसी को नीच और किसीको ऊँच नहीं समझता, सभीमें एक आत्मा देखता है ; बन्धन और मोक्षको भी मनका संकल्प या अम समझता है तथा ब्रह्मज्ञानमें गुरू रहता है और उसमें ही पूर्ण सुख समझता है,—उसमें बढ़कर ज्ञानी और कौन है ? ऐसे ज्ञानीके जीवनमुक्त होनेमें संशय नहीं । उसे जन्म-

( २६४ )

मरणका कष्ट नहीं उठाना पड़ता। वह सदा परमानन्दमें मग्न रहता है, पर ऐसे महापुरुष कोई-कोई ही होते हैं।

सोरठा ।

उच्छ्रवृत्ति गति मान, समदृष्टी इच्छारहित ।

करत तपस्वी ध्यान, कन्था को आसन किये ॥

चेश और समग्र ही पु चैसी

86. Very rarely is a Tapaswi met with who procures his food by begging, who is free from all attachments in the midst of his fellow-men, who leads a life of freedom, who has given up all the transactions of giving and taking, who is content with wearing a sheet made of old, worn out and torn rags of cloth found by the roadside, who has no desire for honour, who is free from vanity and who only takes pleasure in the enjoyment of happiness produced by self-denial.

मातर्मेदिनि तात मारुत ससे तेजः सुबन्धो जलं ।

श्रातन्यौम निबद्ध एव भवतामेष प्रणाभञ्जलिः ॥

कर्म बह मिर खि ओ का हूँ

युष्मत्संगवशोपजातसुष्ठतोद्रेकस्फुरन्तिर्भलं-

ज्ञानापास्तसमस्तमोहमहिमा लीये परे ब्रह्मणि ॥८७॥

हे माता प्रथिवी ! पिता वायु ! मित्र तेज ! वन्धु जल !

भाई आकाश ! अब मैं आपका अन्तिम विदाई का प्रणाम करता हूँ । आपकी संगतिसे मैंने पुण्य-कर्म किये और पुण्योके फल-स्वरूप मुझे आत्मज्ञान हुआ, जिसने मेरे सांसारी मोहका नाश कर दिया । अब मैं परमब्रह्ममें लीन होता हूँ ॥८७॥