भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २८५ )

दुनिया एक ऐसा जाल है, जिसमें प्रायः सभी फँसे हुए हैं। कोई दाना अर्थात् विचारशील पुरुष ही इस जालसे बचा हुआ है।

संसार अन्तः सार-शून्य है, इसमें कुछ नहीं है। यह ठोक आँचलेके समान है, जो ऊपरसे धूल सुन्दर और चिकना-चुपड़ा दोखाता है ; मगर भीतर कुछ नहीं। किसीने संसारको स्वप्नवत् और किसीने इसे कोरा ख़याल ही कहा है ! महा कवि गालिब कहते हैं:—

हस्तीके मत फेरवमें आजाइयो असद ।

आलम तमाम हलक़ ये दामे ख़याल है ॥

गालिब, सृष्टिके चक्रमें मत आ जाना। यह सब प्रपंच तुम्हारे ख़यालके सिवा और कोई चीज़ नहीं है।

इसके जालमें समझदार नहीं फँसते किन्तु नासमझ लोग, जालके किनारोंपर लगी सीपियोंकी चमक-दमक देख कर जालमें आ फँसनेवाली मछलियोंकी तरह, इसके माया-मोहमें फँस कर अनेक प्रकारके कष्ट उठाते हैं ; किन्तु ज्ञानी इसकी अनित्यता, इसकी असारता को देखकर इससे किनारा कर लेते हैं।

दोहा ।

ज्यों सफ़रीको फिरत लख, सागर करत न चोम ।

अगडासे बहागडको, त्यों सन्तनको लोम ॥५३॥