वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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83 What value has the whole world in the eyes of a man wise in the knowledge of self that he may be tempted by it ! The great Ocean is never disturbed by the jumping of a fish !
यदासीद्विज्ञानं स्मरतिभिरसंस्कारजनितं
तदा दृष्टं नारीभ्यभिदृश्येभ्यं जगदपि ॥
इदानीमस्माकं पट्टरविवेकाञ्जनसुषां
समीभूता दृष्टिस्त्रियसुवनमपि ब्रह्म तद्यते ॥८४॥
जब तक हममें कामदेव से पैदा हुआ अज्ञान-अन्धकार था, तब तक हमें सारा जगत् ब्रह्मरूप ही दीखता था। अब हमने विवेक-रूपी अञ्जन आँज लिया है, इससे हमारी दृष्टि समान हो गई है। अब हमें तीनों भुवन ब्रह्मरूप दिखाई देते हैं ॥८४॥
जब हम काम-मदसे अच्छे हो रहे थे, जब हमें अच्छे-बुरेका ज्ञान नहीं था, तब हमें स्त्री-ही-स्त्री दिखाई देती थी, बिना स्त्री हमें क्षण भर भी कल नहीं थी; किन्तु अब हममें विवेक-बुद्धि आ गई है, अब हम अच्छे-बुरेको समझने लगे हैं, इसलिये अब हमें सारा संसार एकसाँ मालूम होता है। अब हमें कहीं स्त्री नहीं दीखती, सभी तो एकसे दीखते हैं। जहाँ नज़र दोड़ाते हैं, वहीं ब्रह्म ही ब्रह्म नज़र आता है। मतलब यह, कि न कोई स्त्री है न कोई पुरुष, सभी तो एकही हैं; केवल चोलेका भेद है। आत्मा न स्त्री है न पुरुष; वह