वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( २८६ )
83 What value has the whole world in the eyes of a man wise in the knowledge of self that he may be tempted by it ! The great Ocean is never disturbed by the jumping of a fish !
यदासीद्विज्ञानं स्मरतिभिरसंस्कारजनितं
तदा दृष्टं नारीभ्यभिदृश्येभ्यं जगदपि ॥
इदानीमस्माकं पट्टरविवेकाञ्जनसुषां
समीभूता दृष्टिस्त्रियसुवनमपि ब्रह्म तद्यते ॥८४॥
जब तक हममें कामदेव से पैदा हुआ अज्ञान-अन्धकार था, तब तक हमें सारा जगत् ब्रह्मरूप ही दीखता था। अब हमने विवेक-रूपी अञ्जन आँज लिया है, इससे हमारी दृष्टि समान हो गई है। अब हमें तीनों भुवन ब्रह्मरूप दिखाई देते हैं ॥८४॥
जब हम काम-मदसे अच्छे हो रहे थे, जब हमें अच्छे-बुरेका ज्ञान नहीं था, तब हमें स्त्री-ही-स्त्री दिखाई देती थी, बिना स्त्री हमें क्षण भर भी कल नहीं थी; किन्तु अब हममें विवेक-बुद्धि आ गई है, अब हम अच्छे-बुरेको समझने लगे हैं, इसलिये अब हमें सारा संसार एकसाँ मालूम होता है। अब हमें कहीं स्त्री नहीं दीखती, सभी तो एकसे दीखते हैं। जहाँ नज़र दोड़ाते हैं, वहीं ब्रह्म ही ब्रह्म नज़र आता है। मतलब यह, कि न कोई स्त्री है न कोई पुरुष, सभी तो एकही हैं; केवल चोलेका भेद है। आत्मा न स्त्री है न पुरुष; वह
( २८७ )
सबमें समान है। मगर अज्ञानियोंको यह बात नहीं दीखती। उन्हें और का और दीखता है।
श्वेताश्वतरोपनिषद्में लिखा है :—
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः।
यवच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥
यह आत्मा न स्त्री है न पुरुष और न नपुंसक। यह जिस जिस शरीरको धारण करता है, उसी-उसीके साथ जुड़ जाता है।
जब मनुष्यको इस बातका ज्ञान हो जाता है कि, स्त्री और पुरुषमें कोई भेद नहीं, जो मैं हूँ वही स्त्री है—स्त्रीने और तरहका कपड़ा पहन रक्खा है और मैंने और तरहका—तब उसका मन स्त्री पर नहीं भूलता। अपने ही स्वरूपको और समझ कर उससे मैथुन करनेकी इच्छा नहीं होती। ज्ञानी को संसारमें शत्रु, मित्र, स्त्री-पुत्र, स्वामी-सेवक नहीं दीखते। वह स्त्री-पुत्र और शत्रु-मित्र सबको समान समझता है; किसीसे राग और किसीसे द्वेष नहीं रखता। उसे कुत्तेमें आदमीमें, तथा प्राणी मात्रमें ही एक विष्णु दीखता है। यह अवस्था परमपदकी अवस्था है। स्वामी शंकराचार्यायजी कहते हैं :—
शत्रौ मिले पुत्रे वन्धौ ।०
मा कुर यत्नं विग्रहसनन्धौ।
( २८८ )
भव समचितः सर्वत्र त्वं ।
वाक्कृत्यचिराद् यदि विष्णुत्वम् ॥
शत्रु, मित्र और पुत्र-बान्धवोंमें विरोध या मेलके लिये चेष्टा न कर । यदि शीघ्र ही मोक्ष-पथ चाहता है तो शत्रु-मित्र और पुत्र-कलत्र प्रभृतिको एक नज़रसे देख । सबको अपना समर्थ, किसीको गुर न समर्थ ; समान चित्त हो जाय । जैसा ही पुत्र वैसे ही स्त्री, जैसा बेटा वैसा दुश्मन और जैसा धन वैसी मिट्टी ।
एक सच्चा महात्मा ।
✧✧✧
एक साधु सदा ज्ञानोन्मत्त अवस्थामें रहता था । वह कभी किसीसे फाल्गु बातचीत नहीं करता था । एक रोज वह गाँवमें शिक्षा माँगने गया । एक घरसे उसे जो रोटी मिली, उसे वह आप खाने लगा और साथमें कुत्तेको भी खिलाने लगा । यह देख वहाँ अनेक लोग इकट्ठे हो गये और उनमेंसे कोई-कोई उसे पगला कहकर उसकी हँसी करने लगे । यह देख महात्माने उनसे कहा—“तुम क्यों हँसते हो ?”
विष्णुः परिस्थितो विष्णुः
विष्णुः खादति विष्णवे ।
( २८६ )
कथं हससिरे विष्णो ? सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥
विष्णुके पास विष्णु है। विष्णु विष्णुको खिलाता है। अरे विष्णु, तू क्यों हँसता है ? सारा जगत् विष्णुमय है ; यानी सारा संसार उस पूर्णात्मा विष्णुसे व्याप्त है।
सच्चे और पहुँचे हुए साधु-पुरुषों सारे संसारमें एक परमात्माको देखते हैं। उन्हें दूसरा कोई नज़र ही नहीं आता। अज्ञानी लोग जिनके ज्ञान-चक्षु बन्द हैं, जगत्में किसीको अपना और किसीको पराया समझते हैं। किसीने क्या अच्छा उपदेश दिया है :—
एकान्ते सुखमाप्त्यां परतरे चेतः समाधीयताम् ।
पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यां जगदिदं तद्व्यापितं दृश्यताम् ।
प्राक्कर्म प्रविलोप्यतां चित्तबलात्पात्र्युत्तरे श्लिष्यतां ।
प्रारब्धं ति्वह सुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थायिताम् ॥
एकान्त-निर्जन स्थानमें सुखसे बैठना चाहिये। परमब्रह्म परमात्मामें मन लगाना चाहिये। पूर्णात्मा पूर्णब्रह्मसे साक्षात् करना चाहिये और इस जगत्को उस पूर्णब्रह्मसे व्याप्त समझना चाहिये। पूर्वजन्मके कर्मोंको लोप करना चाहिये ; और ज्ञानके प्रभावसे अवके किये कर्मोंके फल त्याग देने चाहिये ; यानी निष्काम कर्म करने चाहिये, जिससे कर्म-बन्धनमें बध्दकर फिर जन्म न लेना पड़े। इस संसारमें प्रारब्ध या पूर्व-
१६
( २६० )
जन्मके कर्मोंको भोगना चाहिये और इसके बाद परमेश्वररूप से इस जगत्में उहरना चाहिये ; यानी अपनेमें और परमात्मामें भेद न समझना चाहिये ।
५
वेधा
और
समभ
ही पु
वेसी
दोहा ।
काम-अन्ध जवही भयो, तिय देखी सब ठौर ।
अब विवेक-अंजन किये, लख्यौ अलख सिरमौर ॥८४॥
84. As long as we were in the darkness of ignorance produced by lustful passions, the whole universe seemed to us as if transformed into the shape of women. Now that we have applied to our eyes the collyrium of discrimination between right and wrong, our sight has become calm and the three Bhuvans (regions) appear to us to be the manifestation of Brahma.
रम्याश्चन्द्रमरीचयत्तुणवती रम्या वनान्तस्थली
रम्यः साधुसमागमः शमसुखं कान्येषु रम्याः कथाः ।
कोपोपहितबाष्पविन्दुतरलं रम्यं पियाया मुखं
सर्वरम्यमनित्यतामुपगते चितेनकिञ्चित्पुनः ॥८५॥
चन्द्रमाकी किरणों, हरी-हरी वासके तख्ते, मिलोंका समागम
शृंगारभरसकी कवितायें, क्रीडाशुश्रूसे चञ्चल प्यारीका मुख—
काम अन्ध=कामान्ध । कामदेवके मदसे अन्ध। तिय=ही ।
ठौर=जगह । विवेक अन्जन=विवेक या विचारका अन्जन । लख्यौ=देखा । अलख=अगोचर, अदेखा, जो इन्द्रियों द्वारा न जाना जा सके ।
कभी
बह
मिल
खि
औ
कर
हूँ
( २४१ )
पहले ये सब हमारे मनको मोहित करते थे ; किन्तु जबसे संसार की अनित्यता हमारी समझमें आई, तबसे हमें ये सब अच्छे नहीं लगते ॥८५॥
जबतक मनुष्यको संसारकी असांरता, उसकी अनित्यता, उसका थोथापन, उसकी पोछ नहीं मालूम होती, तभी तक मनुष्य संसार और संसारके भगड़ोंमें फँसा रहता है, और विषय-भोगोंको अच्छा समझता है ; किन्तु संसारकी असलियत मालूम होते ही, उसे विषय-सुखोंसे घृणा हो जाती है। उस समय न उसे चन्द्रमाकी शोतल चाँदनी प्यारी लगती है, न मित्रमण्डली अच्छा मालूम होती है, न श्रृङ्गार-रसकी कवितार्यें अच्छी मालूम होती है और न उसका वित्त चन्द्रवदनी कामि-नियोंकी ही देखकर मचलता है।
क्षपय ।
चन्द चाँदनी रम्य, रम्य वनभूमि पहुपयुत । योही अति रमणीक, मित्र मिलवो है अद्भुत ॥ वनिताके मृदु बोल, महारमणीक विराजत । मानिनमुख रमणीक, हगन रैसुअन भर साजत । ए कहे परमरमणीक सब, सब कोज चितमें चहत । इनकाँ विनाश जब देखिये, तब इनमें कछुह न रहत ॥८६॥
चन्द्रचाँदनी=चन्द्रमाकी चाँदनी । रम्य=मनोहर । वनभूमि=जङ्गल
( २६२ )
85. The rays of the moon, the forest glades covered with green grass, the society of friends, the works of literature possessing beauties of composition, the faces of the beloved ones made resplendent by the drops of tears caused by anger, all captivated our heart at first. But since we have realised the destructibility of the world, all these things have lost their attractiveness and our mind is now absolutely vacant,
चेष्टा और समः ही पु वैसी
भिन्नाशी जनमव्यसंगरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा । दानदानविरक्तभार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः ॥ रथ्याच्चीणविशीर्णजीर्णवसैनः संप्रासकन्यासखि- निर्मानो निरहंङ्कतिः शमसुखाभोगैकवद्वस्तुहः ॥८६॥
ऐसा तपस्वी कोई विरला ही होता है, जो भौख मोगकर खाता है, जो अपने लोगोंमें रहकर भी उनमें मोह नहीं रखता, जो स्वाधीनता-पूर्वक अपना जीवन निर्वह करता है, जिसने लेने और देनेका व्यवहार छोड़ दिया है, जो राहमें पड़े हुए चिथड़ोंकी गुदड़ी ओढ़ता है, जिसे मानका ख्याल नहीं है, जिसमें अभिमान नहीं है और जो ब्रह्मज्ञानके सुखको ही सुख मानता है ॥८६॥
ज्ञानीके लक्षण सुन्दरदासजीने इस भाँति कहे हैं—
की-धरती । पुडुपयुत=फूलोंसे छायी हुई । बनिता=झी । सडु=मधुर । बोल=वार्ते । मानिन=मानिनी झी । हगन=आँखोंसे । अघघन भर= आँसुओंकी भड़ी ।
कर्म बह मिर बि ओ क हूं
( २६३ )
कर्म न विकर्म करे, भाव न अभाव घरे । शुभ न अशुभ परे, यातें निधरक है ॥ वस तीन शून्य जाके, पापहु न पुण्य ताके । अधिक न न्यून जाके, स्वर्ग न नरक है ॥ सुख दुःख सम दोज, नीचहुँ न ऊँच कोज । ऐसी विधि रहै सोउ, मिल्थो न फरक है ॥ एकही न दोय जाने, बंध मोक्ष अम मानै । सुन्दर कहत, ज्ञानी ज्ञानमें गरक है ॥
जो भीषण माँगकर पेटकी अग्निको शान्त कर लेता है, पर किसीकी खुशामद नहीं करता, किसीके अधीन नहीं होता, स्वाधीन रहता है ; राहमें पड़े हुए विधदे उठाकर उनकी ही गुदड़ी बना कर ओढ़ लेता है ; मान अपमान और सुख-दुःखको समान समझता है ; न किसीसे कुछ लेता है और न किसीको कुछ देता है ; गृहस्थीमें या अपने बन्धु- बान्धवोंमें रहकर भी उनमें समता नहीं रखता ; शुभाशुभ, याप-पुण्य और स्वर्ग नरकको कोई चीज़ नहीं समझता ; किसी को नीच और किसीको ऊँच नहीं समझता, सभीमें एक आत्मा देखता है ; बन्धन और मोक्षको भी मनका संकल्प या अम समझता है तथा ब्रह्मज्ञानमें गुरू रहता है और उसमें ही पूर्ण सुख समझता है,—उसमें बढ़कर ज्ञानी और कौन है ? ऐसे ज्ञानीके जीवनमुक्त होनेमें संशय नहीं । उसे जन्म-
( २६४ )
मरणका कष्ट नहीं उठाना पड़ता। वह सदा परमानन्दमें मग्न रहता है, पर ऐसे महापुरुष कोई-कोई ही होते हैं।
सोरठा ।
उच्छ्रवृत्ति गति मान, समदृष्टी इच्छारहित ।
करत तपस्वी ध्यान, कन्था को आसन किये ॥
चेश और समग्र ही पु चैसी
86. Very rarely is a Tapaswi met with who procures his food by begging, who is free from all attachments in the midst of his fellow-men, who leads a life of freedom, who has given up all the transactions of giving and taking, who is content with wearing a sheet made of old, worn out and torn rags of cloth found by the roadside, who has no desire for honour, who is free from vanity and who only takes pleasure in the enjoyment of happiness produced by self-denial.
मातर्मेदिनि तात मारुत ससे तेजः सुबन्धो जलं ।
श्रातन्यौम निबद्ध एव भवतामेष प्रणाभञ्जलिः ॥
कर्म बह मिर खि ओ का हूँ
युष्मत्संगवशोपजातसुष्ठतोद्रेकस्फुरन्तिर्भलं-
ज्ञानापास्तसमस्तमोहमहिमा लीये परे ब्रह्मणि ॥८७॥
हे माता प्रथिवी ! पिता वायु ! मित्र तेज ! वन्धु जल !
भाई आकाश ! अब मैं आपका अन्तिम विदाई का प्रणाम करता हूँ । आपकी संगतिसे मैंने पुण्य-कर्म किये और पुण्योके फल-स्वरूप मुझे आत्मज्ञान हुआ, जिसने मेरे सांसारी मोहका नाश कर दिया । अब मैं परमब्रह्ममें लीन होता हूँ ॥८७॥
( २६५ )
मनुष्य-शरीर पृथ्वी, वायु, तेज, जल और आकाश—पाँच तत्त्वोंसे बनता है। जिसे आत्मज्ञान हो गया है, जिसने ब्रह्म को पहचान लिया है, वह इन पाँचों तत्त्वोंसे विदा लेता है और प्रणाम करके कहता है, कि मैं आप पाँचोंके सङ्ग रहनेसे—यह शरीर धारण करने से—इस योग्य हुआ कि, ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सका; अब मेरा आपका साथ न होगा, अब मैं चोलेमें न आऊँगा, अब मुझे जन्म लेना न पड़ेगा। मैं आप लोगोंका कृतज्ञ हूँ; क्योंकि आप की सुसंगति से ही मुझे यह फल मिला है। अब मैं आपसे सदा को विदा होता हूँ। अब मैं ब्रह्मके आनन्द में मग्न हूँ। अब मुझे यहाँ आनेकी, आप लोगोंकी संगति करने की; यानी शरीर धारण करने की ज़रूरत नहीं। मतलब यह है, कि मनुष्यका चोला ब्रह्मज्ञान के लिए मिलता है; और चोलोंमें यह ज्ञान हो नहीं सकता। जो मनुष्य-चोलेमें आकर ब्रह्मज्ञान लाभ करते हैं और उसकी बदौलत परम पद या मोक्ष प्राप्त करते हैं,—वे ही धन्य हैं, उन्हींका मनुष्य-देह पाना सार्थक है।
इप्यय ।
अरी मेदिनी-मात, तात-मारुत सुन एरे ।
तेज-सखा जल-श्रात, व्योम-बन्धु सुन मेरे ।
तुमको करत प्रणाम, हाथ तुम आगे जोरत ।
तुम्हरेही सत्सांग, सुकृतकौ सिन्धु भक्रोरत ।
( ३६६ )
अज्ञान जगित यह मोहदू, मिट्ठ्यों तिहारे संगसों ।
आनन्द अखण्डानन्दको, छाप रहो रसरंग सों ॥८७॥
87. O mother Earth, O father Air, O friend Light, O kinsman Water, O brother space, I did you all my last farewell greeting ! In company with you, as the composite parts of my physical body, I did the good deeds which bore the fruit of endowing me with pure self-consciousness which again destroyed all my earthly attachments. I now go to be absorbed in the Supreme Eternal.
चेष्टा और समर्थ ही पु वेसी
यावत्त्वस्थभिर्द कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा
यावच्चोन्द्रियशक्तिरप्रतिहिता यावत्त्वयो नायुषः ॥
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महा-
न्मोदीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ॥८८॥
कर्म बह मिर खि औ का हूं
जब तक शरीर ठीक हालतमें है, बुढ़ापा दूर है, इन्द्रियों की शक्ति बनी हुई है, आयुके दिन बाकी हैं, तभी तक बुद्धिमान को अपने कल्याणकी चेष्टा अच्छी तरह से कर लेनी चाहिये । घर जलने पर कूबों खोदने से क्या फायदा ? ॥८८॥
जब तक आपका शरीर निरोग और तन्दुरुस्त रहे, बुढ़ापा न आवे, आपको इन्द्रियोंकी शक्ति ठीक बनी रहे, आपका अन्त दूर हो, उम्र बाकी दीखे, तभी तक आप अपनी भलाई की चेष्टा कर लीजिये ; यानी ऐसी हालतमें ही भगवान्का भजन कर लीजिये । जब आप रोगसे जर्जरित हो जायेंगे,
( २६७ )
कफ-खाँसी और दम घेर लेंगे, आँखोंसे न दीखेगा, कानोंसे न सुनाई देगा, गलेमें घर-घर कफ बोलने लगेगा, मौत अपना पन्ना जमा देगी, तब आप क्या करेंगे ? अर्थात् कुछ नहीं । उस समय यदि आप कुछ करनेकी चेष्टा करेंगे भी, तो आपकी दशा उसकी सी होगी, जो घरमें आग लगने पर कूआ खोदता है ।
किसीने कहा है :—
प्रथमे नाजिता विद्या, द्वितीये नाजितं धनं ।
तृतीये नाजितं पुरयं, चतुर्थे किं करिष्यति ॥
बचपनमें यदि विद्या नहीं सीखी, जवानोंमें यदि धन सञ्चय नहीं किया, बुढ़ापेमें यदि पुण्य नहीं किया ; तो वौधेपनमें क्या करोगे ?
सबसे अच्छी बात तो बचपनमें ही परमात्मा की भक्ति करना है । भुव और प्रह्लादने बचपनमें ही भक्ति करके परमात्मके दर्शन किये थे । अगर इस उम्रमें न हो सके, तो जवानोंमें ; और जवानोंमें भी न हो सके तो बुढ़ापे में तो चूकना ही न चाहिये । खों-पुत्र धन-दौलत का मोह छोड़, परमात्मामें मन लगाओ ; आज-कल पर मत टालो ; क्योंकि मौत हर समय घातमें है, न जाने कब तुम्हें लेजाय । जब वह आजायगी, तब तुमसे कुछ करते-घरते न बनेगा, तुम घबरा जाओगे, मुह से परमात्माका नाम न निकलेगा और हाथोंसे दान या पराया उपकार न कर सकोगे । उस समय तुम्हारा परलोक
( २६८ )
बनाने की चेष्टा करना, आग लग जाने पर कुआँ खोदने वाले के समान मूर्खतापूर्ण काम होगा। अतः जो करना है, मरने के समयसे पहले ही करो। किसीने परलोक-साधनके लिये क्या अच्छी सलाह दी है :—
वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वदुष्टीयतां तेनैश्वर्यपिधीयतामपचितः कामे यतिसत्यज्यताम् ; पापीषः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयताम् ॥ आत्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात् तूर्थां विनिर्गम्यताम् ॥
नित्य वेद पढ़ो और वेदोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करो। वेद-विधिसे परमेश्वरकी पूजा करो। विषय-भोगोंको बुद्धिसे हटाओ ; यानी विषयोंको त्यागो। पाप-समूहका निवारण करो। संसारी सुख इन्-फुलेल-बन्दनादिके लगाने, ह्री-भोगने और नाच-गाना देखने-सुनने प्रभृतिका परिणाम विचारो ; यानी इनके दोषोंकी भावना करो। परमेश्वर या आत्मामें अनुराग करो और गृहस्थोंके अनेक दोषोंको समझ कर, शीघ्र ही घरको त्याग कर वनको चले जाओ।
उत्ताद् जौक कहते हैं—
• बेनिशों पहले फनासे हो, जो हो तुम्हको बका। • वनाँ है किसका निशों, जौके फनाने रक्खा ॥
मरनेसे पहले सांसारिक बन्धनोंसे अपने वित्तको हटा
( २६६ )
ले—अमर होनेको यही एक तरकीब है ; बर्ना मौत किसीका निशान नहीं छोड़ती ।
छप्पय ।
जों लौं देह निरोग, और जों लौं न जरा तन । अरु जों लौं बलवान् आयु, अरु इन्द्रिनके गन । तौं लौं निज कल्याण करन को, यल विचारत । वह पण्डित वह धीर वीर, जो प्रथम संहारत । फिर होता कहा जजीर भये, जप तप संयम नहि बनत । भव काम उठयौं निज भवन जब, तब क्योंकर कूपहि खनत ॥८८॥
88. As long as the body is in good health and old age is still far off, as long as the faculties of senses are strong and the end of life has not come, a wise man should try his best for his spiritual weal. When the house has caught fire what is the use of attempting to dig a well.
नाभ्यस्ता सुवि वादिश्वन्दमनी विद्या विनीतोचिता
खड्गाग्रैः करिकुम्भीठलनैर्नाकं न नीतं यशः
कान्ताकोमलपल्लवाधररसः पीतो न चन्द्रोदये
तारुण्यं गतमेव निष्फलमहो शून्यालयं दीप्तवत् ॥८९॥
हमने इस जगतमें नम्रोंको सन्तुष्ट करनेवाली और वादियोंका मान भञ्जन करनेवाली विद्या नहीं पढ़ी, तलवारकी धार से हार्थीके मस्तक का पिछला भाग काटकर अपना यश स्वर्ग तक नहीं
( ३०० )
पहुँचाया ; चौदनी रातमें सुन्दरीके कोमल अंधर-पल्लव (निचले होठ) का रस भी नहीं पिया। हाय ! हमारी जवानी सूने घरमें जलने वाले और आपही बुझ जाने वाले दीपककी तरह योंही गयी ॥८६॥
दोहा ।
थिया पढ़ी न रिपु दले, रहौ न नारि समीप ।
योगन यह योंही गयो, ज्यों सूने ग्रह दीप ॥८७॥
89, We did not attain in this world literary knowledge which pleases the meek and puts down the vanity of the crowds of critics, Nor did we extend our fame up to the gates of Swarga by cutting down the backs of elephants' heads with the edge of a sword. Nor did we drink in the moonlight the flowery juice of the soft lower lips of our beloved ones. Alas ! that our youth has passed away uselessly like a burning lamp in an empty house, which spends itself away without being of any use to anybody.
ज्ञानं सतां मानमदादिनाथनं
केषांचिदेतन्मदमानकारणम् ॥
स्थानं विचिक्तं यमिनां विमुक्तये
कामातुराणामतिकामकारणम् ॥८०॥
अच्छे मनुष्योंमें तो ज्ञान उनके मान-मद आदिका नाश करता है ; किन्तु दुष्टोंमें वही ज्ञान मान-मद प्रभृति योगुणोंकी वृद्धि करता है । एकान्त स्थान योगियोंके लिये तो मुक्ति दिलानेवाला
( ३०१ )
होता है ; किन्तु वही कामियों की कामञ्ज्वाला को बढ़ानेवाला होता है ॥६०॥
जिस तरह स्वाति-बूँद सीपमें पड़नेसे मोती और केहेमें कपूर हो जाती है, किन्तु सर्पमुखमें पड़नेसे विषका रूप धारण करती है ; उसी तरह एक हो चीज पुष्प-भेदसे अलग-अलग गुण दिखाती है। ज्ञानसे अच्छे लोगोंका अभिमान नाश हो जाता है, वे सब किसीको अपने बराबर समझते हैं, सबके साथ सहानुभूति रखते हैं, किसीका दिल नहीं दुखाते ; किन्तु उसी ज्ञानसे दुष्ट लोगोंकी दुष्टता और भी बढ़ जाती है, वे अपने सामने जगत्को तुच्छ समझते हैं ; विद्याभिमानके मारे किसीकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखते, अपने सिवा सबको पशु समझते हैं। एक ही ज्ञान दो स्थानोंमें स्थान-भेदसे अपना अलग-अलग प्रभाव दिखाता है। जैसे ; एकान्त स्थान योगियोंके चित्तको ब्रह्मविचारमें लीन करता है और इससे उनको परमपद-मुक्ति-मिल जाती है ; किन्तु वही एकान्त स्थान कामियोंके दिलोंमें मस्ती पैदा करता है।
दोहा ।
ज्ञान घटावै मान मद, ज्ञानहि देय बदाय ।
रहसि मुक्ति पावै यती, कामी रत लपटाय ॥६०॥
90 Knowledge serves the good men as a destroyer of their vanity and false pride. In some, it enhances the same evils.
इती (२)
एक
ग, के नु
( ३०२ )
A lonely place is for the spiritual salvation of those who practise self-restraint, while it increases hundredfold the lust of sensual people.
जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरां यौवनं हन्तागिषु गुणाश्च वध्यफलतां याता गुणवैर्बिना ॥
किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतांतोऽक्षमी
द्वाहातांस्मरशासनान्त्रिगुणं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ॥६१॥
हमारी इच्छायें हमारे हृदयमें ही जीर्ण हो गई, जवानी भी चली गई, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कुरददानीके न होनेसे बेकार हो गये, सर्वशक्तिमान् सर्वनाशक काल ( मृत्यु ) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है; इसलिये अब हमारी समझमें कामारि शिवके चरणोंके सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ॥६१॥
मनुष्य दुःखित होकर कहता है,—हमारे मनको मनमें ही रह गई, हमारे अर्मान न निकले, और जवानी कुछ कर गई; अब उसके आनेकी भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसीकी भी लौटकर आती सुनी नहीं।
मनुष्यकी तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक-पर-एक इच्छा उठा ही कसती है। इच्छायें पूरा नहीं होतीं और मौन आ जरती है। महाकवि गालिब भी पछता कर कहते हैं :—
हजारों स्वाहिरों ऐसी, कि हर स्वाहिस पै दम निकले। बहुत निकले मेरे अर्मान, लेकिन फिर भी कम निकले ॥
( ३०३ )
महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—
भरे हुए हैं हजारों असीं ।
फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।
कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।
मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।
मेरे मनमें हजारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूर्ण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है। हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया। अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—
तीनाहिं लोक अहार कियो सब ।
साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।
कादल आँख डरावत यानी ॥
दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।
या हिरा मैं यह डाकिनि जानी ॥
सुन्दर खात भये कितने दिन !
हे तृष्णा ! अजहू न अधानी ॥
इस तृष्णासे सभी समर्थद्वार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर ऐसी ही बातें कही हैं। इस तृष्णाके
( ३०२ )
A lonely place is for the spiritual salvation of those who practise self-restraint, while it increases hundredfold the lust of sensual people.
जीर्ण एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरां यौवनं हन्तंगिषु गुणारच वंध्यफलतां याता गुणैर्बिना ॥ किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतांतोऽचमी
ब्राह्मातंसंस्मरशासनांध्रियुगलं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ॥६१॥
हमारी इच्छायें हमारे हृदयमें ही जीर्ण हो गई, जवानी भी चली गई, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कुरददानोंके न होनेसे बेकार हो गये, सर्वशक्तिमान् सर्वनाशक काल ( मृत्यु ) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है ; इसलिये अब हमारी समझमें कामारि शिवके चरणोंके सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ॥६१॥
मनुष्य दुःखित होकर कहता है,—हमारे मनकी मनमें ही रह गई, हमारे अर्मान न निकले, और जवानी कूँच कर गई ; अब उसके आनेकी भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसीकी भी लौटकर आती सुनी नहीं ।
मनुष्यकी तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक-पर-एक इच्छा उठा ही कसती है । इच्छायें पूरो नहीं होतीं और मौन आ जाता है । महाकवि गाल्छिब भी पछता कर कहते हैं :—
हजारों स्वप्नहिशें ऐसी, कि हर स्वप्नहिश पै दम निकले । बहुत निकले झेरे अर्मान, लेकिन फिर भी कम निकले ॥
( ३०३ )
महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—
भरे हुए हैं हज़ारों अर्मी ।
फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।
कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।
मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।
मेरे मनमें हज़ारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है । हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया । अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—
तीनहिं लोक अहार कियो सब ।
साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।
कादत आँख डरावत यानी ॥
दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।
या हिरा मैं यह ढाकिन यानी ॥
सुन्दर खात भये कितने दिन !
हे तृष्णा ! अजहु न अधानी ॥
इस तृष्णासे सभी सर्मभ्दार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर पेसी हो बाते कही हैं । इस तृष्णाके