भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २४१ )

पहले ये सब हमारे मनको मोहित करते थे ; किन्तु जबसे संसार की अनित्यता हमारी समझमें आई, तबसे हमें ये सब अच्छे नहीं लगते ॥८५॥

जबतक मनुष्यको संसारकी असांरता, उसकी अनित्यता, उसका थोथापन, उसकी पोछ नहीं मालूम होती, तभी तक मनुष्य संसार और संसारके भगड़ोंमें फँसा रहता है, और विषय-भोगोंको अच्छा समझता है ; किन्तु संसारकी असलियत मालूम होते ही, उसे विषय-सुखोंसे घृणा हो जाती है। उस समय न उसे चन्द्रमाकी शोतल चाँदनी प्यारी लगती है, न मित्रमण्डली अच्छा मालूम होती है, न श्रृङ्गार-रसकी कवितार्यें अच्छी मालूम होती है और न उसका वित्त चन्द्रवदनी कामि-नियोंकी ही देखकर मचलता है।

क्षपय ।

चन्द चाँदनी रम्य, रम्य वनभूमि पहुपयुत । योही अति रमणीक, मित्र मिलवो है अद्भुत ॥ वनिताके मृदु बोल, महारमणीक विराजत । मानिनमुख रमणीक, हगन रैसुअन भर साजत । ए कहे परमरमणीक सब, सब कोज चितमें चहत । इनकाँ विनाश जब देखिये, तब इनमें कछुह न रहत ॥८६॥

चन्द्रचाँदनी=चन्द्रमाकी चाँदनी । रम्य=मनोहर । वनभूमि=जङ्गल