वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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जन्मके कर्मोंको भोगना चाहिये और इसके बाद परमेश्वररूप से इस जगत्में उहरना चाहिये ; यानी अपनेमें और परमात्मामें भेद न समझना चाहिये ।
५
वेधा
और
समभ
ही पु
वेसी
दोहा ।
काम-अन्ध जवही भयो, तिय देखी सब ठौर ।
अब विवेक-अंजन किये, लख्यौ अलख सिरमौर ॥८४॥
84. As long as we were in the darkness of ignorance produced by lustful passions, the whole universe seemed to us as if transformed into the shape of women. Now that we have applied to our eyes the collyrium of discrimination between right and wrong, our sight has become calm and the three Bhuvans (regions) appear to us to be the manifestation of Brahma.
रम्याश्चन्द्रमरीचयत्तुणवती रम्या वनान्तस्थली
रम्यः साधुसमागमः शमसुखं कान्येषु रम्याः कथाः ।
कोपोपहितबाष्पविन्दुतरलं रम्यं पियाया मुखं
सर्वरम्यमनित्यतामुपगते चितेनकिञ्चित्पुनः ॥८५॥
चन्द्रमाकी किरणों, हरी-हरी वासके तख्ते, मिलोंका समागम
शृंगारभरसकी कवितायें, क्रीडाशुश्रूसे चञ्चल प्यारीका मुख—
काम अन्ध=कामान्ध । कामदेवके मदसे अन्ध। तिय=ही ।
ठौर=जगह । विवेक अन्जन=विवेक या विचारका अन्जन । लख्यौ=देखा । अलख=अगोचर, अदेखा, जो इन्द्रियों द्वारा न जाना जा सके ।
कभी
बह
मिल
खि
औ
कर
हूँ