भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २८६ )

कथं हससिरे विष्णो ? सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥

विष्णुके पास विष्णु है। विष्णु विष्णुको खिलाता है। अरे विष्णु, तू क्यों हँसता है ? सारा जगत् विष्णुमय है ; यानी सारा संसार उस पूर्णात्मा विष्णुसे व्याप्त है।

सच्चे और पहुँचे हुए साधु-पुरुषों सारे संसारमें एक परमात्माको देखते हैं। उन्हें दूसरा कोई नज़र ही नहीं आता। अज्ञानी लोग जिनके ज्ञान-चक्षु बन्द हैं, जगत्में किसीको अपना और किसीको पराया समझते हैं। किसीने क्या अच्छा उपदेश दिया है :—

एकान्ते सुखमाप्त्यां परतरे चेतः समाधीयताम् ।

पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यां जगदिदं तद्व्यापितं दृश्यताम् ।

प्राक्कर्म प्रविलोप्यतां चित्तबलात्पात्र्युत्तरे श्लिष्यतां ।

प्रारब्धं ति्वह सुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थायिताम् ॥

एकान्त-निर्जन स्थानमें सुखसे बैठना चाहिये। परमब्रह्म परमात्मामें मन लगाना चाहिये। पूर्णात्मा पूर्णब्रह्मसे साक्षात् करना चाहिये और इस जगत्को उस पूर्णब्रह्मसे व्याप्त समझना चाहिये। पूर्वजन्मके कर्मोंको लोप करना चाहिये ; और ज्ञानके प्रभावसे अवके किये कर्मोंके फल त्याग देने चाहिये ; यानी निष्काम कर्म करने चाहिये, जिससे कर्म-बन्धनमें बध्दकर फिर जन्म न लेना पड़े। इस संसारमें प्रारब्ध या पूर्व-

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