भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २८८ )

भव समचितः सर्वत्र त्वं ।

वाक्कृत्यचिराद् यदि विष्णुत्वम् ॥

शत्रु, मित्र और पुत्र-बान्धवोंमें विरोध या मेलके लिये चेष्टा न कर । यदि शीघ्र ही मोक्ष-पथ चाहता है तो शत्रु-मित्र और पुत्र-कलत्र प्रभृतिको एक नज़रसे देख । सबको अपना समर्थ, किसीको गुर न समर्थ ; समान चित्त हो जाय । जैसा ही पुत्र वैसे ही स्त्री, जैसा बेटा वैसा दुश्मन और जैसा धन वैसी मिट्टी ।

एक सच्चा महात्मा ।

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एक साधु सदा ज्ञानोन्मत्त अवस्थामें रहता था । वह कभी किसीसे फाल्गु बातचीत नहीं करता था । एक रोज वह गाँवमें शिक्षा माँगने गया । एक घरसे उसे जो रोटी मिली, उसे वह आप खाने लगा और साथमें कुत्तेको भी खिलाने लगा । यह देख वहाँ अनेक लोग इकट्ठे हो गये और उनमेंसे कोई-कोई उसे पगला कहकर उसकी हँसी करने लगे । यह देख महात्माने उनसे कहा—“तुम क्यों हँसते हो ?”

विष्णुः परिस्थितो विष्णुः

विष्णुः खादति विष्णवे ।