भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सबमें समान है। मगर अज्ञानियोंको यह बात नहीं दीखती। उन्हें और का और दीखता है।

श्वेताश्वतरोपनिषद्में लिखा है :—

नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः।

यवच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥

यह आत्मा न स्त्री है न पुरुष और न नपुंसक। यह जिस जिस शरीरको धारण करता है, उसी-उसीके साथ जुड़ जाता है।

जब मनुष्यको इस बातका ज्ञान हो जाता है कि, स्त्री और पुरुषमें कोई भेद नहीं, जो मैं हूँ वही स्त्री है—स्त्रीने और तरहका कपड़ा पहन रक्खा है और मैंने और तरहका—तब उसका मन स्त्री पर नहीं भूलता। अपने ही स्वरूपको और समझ कर उससे मैथुन करनेकी इच्छा नहीं होती। ज्ञानी को संसारमें शत्रु, मित्र, स्त्री-पुत्र, स्वामी-सेवक नहीं दीखते। वह स्त्री-पुत्र और शत्रु-मित्र सबको समान समझता है; किसीसे राग और किसीसे द्वेष नहीं रखता। उसे कुत्तेमें आदमीमें, तथा प्राणी मात्रमें ही एक विष्णु दीखता है। यह अवस्था परमपदकी अवस्था है। स्वामी शंकराचार्यायजी कहते हैं :—

शत्रौ मिले पुत्रे वन्धौ ।०

मा कुर यत्नं विग्रहसनन्धौ।