वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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85. The rays of the moon, the forest glades covered with green grass, the society of friends, the works of literature possessing beauties of composition, the faces of the beloved ones made resplendent by the drops of tears caused by anger, all captivated our heart at first. But since we have realised the destructibility of the world, all these things have lost their attractiveness and our mind is now absolutely vacant,
चेष्टा और समः ही पु वैसी
भिन्नाशी जनमव्यसंगरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा । दानदानविरक्तभार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः ॥ रथ्याच्चीणविशीर्णजीर्णवसैनः संप्रासकन्यासखि- निर्मानो निरहंङ्कतिः शमसुखाभोगैकवद्वस्तुहः ॥८६॥
ऐसा तपस्वी कोई विरला ही होता है, जो भौख मोगकर खाता है, जो अपने लोगोंमें रहकर भी उनमें मोह नहीं रखता, जो स्वाधीनता-पूर्वक अपना जीवन निर्वह करता है, जिसने लेने और देनेका व्यवहार छोड़ दिया है, जो राहमें पड़े हुए चिथड़ोंकी गुदड़ी ओढ़ता है, जिसे मानका ख्याल नहीं है, जिसमें अभिमान नहीं है और जो ब्रह्मज्ञानके सुखको ही सुख मानता है ॥८६॥
ज्ञानीके लक्षण सुन्दरदासजीने इस भाँति कहे हैं—
की-धरती । पुडुपयुत=फूलोंसे छायी हुई । बनिता=झी । सडु=मधुर । बोल=वार्ते । मानिन=मानिनी झी । हगन=आँखोंसे । अघघन भर= आँसुओंकी भड़ी ।
कर्म बह मिर बि ओ क हूं