वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 400, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६३ )
कर्म न विकर्म करे, भाव न अभाव घरे । शुभ न अशुभ परे, यातें निधरक है ॥ वस तीन शून्य जाके, पापहु न पुण्य ताके । अधिक न न्यून जाके, स्वर्ग न नरक है ॥ सुख दुःख सम दोज, नीचहुँ न ऊँच कोज । ऐसी विधि रहै सोउ, मिल्थो न फरक है ॥ एकही न दोय जाने, बंध मोक्ष अम मानै । सुन्दर कहत, ज्ञानी ज्ञानमें गरक है ॥
जो भीषण माँगकर पेटकी अग्निको शान्त कर लेता है, पर किसीकी खुशामद नहीं करता, किसीके अधीन नहीं होता, स्वाधीन रहता है ; राहमें पड़े हुए विधदे उठाकर उनकी ही गुदड़ी बना कर ओढ़ लेता है ; मान अपमान और सुख-दुःखको समान समझता है ; न किसीसे कुछ लेता है और न किसीको कुछ देता है ; गृहस्थीमें या अपने बन्धु- बान्धवोंमें रहकर भी उनमें समता नहीं रखता ; शुभाशुभ, याप-पुण्य और स्वर्ग नरकको कोई चीज़ नहीं समझता ; किसी को नीच और किसीको ऊँच नहीं समझता, सभीमें एक आत्मा देखता है ; बन्धन और मोक्षको भी मनका संकल्प या अम समझता है तथा ब्रह्मज्ञानमें गुरू रहता है और उसमें ही पूर्ण सुख समझता है,—उसमें बढ़कर ज्ञानी और कौन है ? ऐसे ज्ञानीके जीवनमुक्त होनेमें संशय नहीं । उसे जन्म-