वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( २६३ )
कर्म न विकर्म करे, भाव न अभाव घरे । शुभ न अशुभ परे, यातें निधरक है ॥ वस तीन शून्य जाके, पापहु न पुण्य ताके । अधिक न न्यून जाके, स्वर्ग न नरक है ॥ सुख दुःख सम दोज, नीचहुँ न ऊँच कोज । ऐसी विधि रहै सोउ, मिल्थो न फरक है ॥ एकही न दोय जाने, बंध मोक्ष अम मानै । सुन्दर कहत, ज्ञानी ज्ञानमें गरक है ॥
जो भीषण माँगकर पेटकी अग्निको शान्त कर लेता है, पर किसीकी खुशामद नहीं करता, किसीके अधीन नहीं होता, स्वाधीन रहता है ; राहमें पड़े हुए विधदे उठाकर उनकी ही गुदड़ी बना कर ओढ़ लेता है ; मान अपमान और सुख-दुःखको समान समझता है ; न किसीसे कुछ लेता है और न किसीको कुछ देता है ; गृहस्थीमें या अपने बन्धु- बान्धवोंमें रहकर भी उनमें समता नहीं रखता ; शुभाशुभ, याप-पुण्य और स्वर्ग नरकको कोई चीज़ नहीं समझता ; किसी को नीच और किसीको ऊँच नहीं समझता, सभीमें एक आत्मा देखता है ; बन्धन और मोक्षको भी मनका संकल्प या अम समझता है तथा ब्रह्मज्ञानमें गुरू रहता है और उसमें ही पूर्ण सुख समझता है,—उसमें बढ़कर ज्ञानी और कौन है ? ऐसे ज्ञानीके जीवनमुक्त होनेमें संशय नहीं । उसे जन्म-
( २६४ )
मरणका कष्ट नहीं उठाना पड़ता। वह सदा परमानन्दमें मग्न रहता है, पर ऐसे महापुरुष कोई-कोई ही होते हैं।
सोरठा ।
उच्छ्रवृत्ति गति मान, समदृष्टी इच्छारहित ।
करत तपस्वी ध्यान, कन्था को आसन किये ॥
चेश और समग्र ही पु चैसी
86. Very rarely is a Tapaswi met with who procures his food by begging, who is free from all attachments in the midst of his fellow-men, who leads a life of freedom, who has given up all the transactions of giving and taking, who is content with wearing a sheet made of old, worn out and torn rags of cloth found by the roadside, who has no desire for honour, who is free from vanity and who only takes pleasure in the enjoyment of happiness produced by self-denial.
मातर्मेदिनि तात मारुत ससे तेजः सुबन्धो जलं ।
श्रातन्यौम निबद्ध एव भवतामेष प्रणाभञ्जलिः ॥
कर्म बह मिर खि ओ का हूँ
युष्मत्संगवशोपजातसुष्ठतोद्रेकस्फुरन्तिर्भलं-
ज्ञानापास्तसमस्तमोहमहिमा लीये परे ब्रह्मणि ॥८७॥
हे माता प्रथिवी ! पिता वायु ! मित्र तेज ! वन्धु जल !
भाई आकाश ! अब मैं आपका अन्तिम विदाई का प्रणाम करता हूँ । आपकी संगतिसे मैंने पुण्य-कर्म किये और पुण्योके फल-स्वरूप मुझे आत्मज्ञान हुआ, जिसने मेरे सांसारी मोहका नाश कर दिया । अब मैं परमब्रह्ममें लीन होता हूँ ॥८७॥
( २६५ )
मनुष्य-शरीर पृथ्वी, वायु, तेज, जल और आकाश—पाँच तत्त्वोंसे बनता है। जिसे आत्मज्ञान हो गया है, जिसने ब्रह्म को पहचान लिया है, वह इन पाँचों तत्त्वोंसे विदा लेता है और प्रणाम करके कहता है, कि मैं आप पाँचोंके सङ्ग रहनेसे—यह शरीर धारण करने से—इस योग्य हुआ कि, ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सका; अब मेरा आपका साथ न होगा, अब मैं चोलेमें न आऊँगा, अब मुझे जन्म लेना न पड़ेगा। मैं आप लोगोंका कृतज्ञ हूँ; क्योंकि आप की सुसंगति से ही मुझे यह फल मिला है। अब मैं आपसे सदा को विदा होता हूँ। अब मैं ब्रह्मके आनन्द में मग्न हूँ। अब मुझे यहाँ आनेकी, आप लोगोंकी संगति करने की; यानी शरीर धारण करने की ज़रूरत नहीं। मतलब यह है, कि मनुष्यका चोला ब्रह्मज्ञान के लिए मिलता है; और चोलोंमें यह ज्ञान हो नहीं सकता। जो मनुष्य-चोलेमें आकर ब्रह्मज्ञान लाभ करते हैं और उसकी बदौलत परम पद या मोक्ष प्राप्त करते हैं,—वे ही धन्य हैं, उन्हींका मनुष्य-देह पाना सार्थक है।
इप्यय ।
अरी मेदिनी-मात, तात-मारुत सुन एरे ।
तेज-सखा जल-श्रात, व्योम-बन्धु सुन मेरे ।
तुमको करत प्रणाम, हाथ तुम आगे जोरत ।
तुम्हरेही सत्सांग, सुकृतकौ सिन्धु भक्रोरत ।
( ३६६ )
अज्ञान जगित यह मोहदू, मिट्ठ्यों तिहारे संगसों ।
आनन्द अखण्डानन्दको, छाप रहो रसरंग सों ॥८७॥
87. O mother Earth, O father Air, O friend Light, O kinsman Water, O brother space, I did you all my last farewell greeting ! In company with you, as the composite parts of my physical body, I did the good deeds which bore the fruit of endowing me with pure self-consciousness which again destroyed all my earthly attachments. I now go to be absorbed in the Supreme Eternal.
चेष्टा और समर्थ ही पु वेसी
यावत्त्वस्थभिर्द कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा
यावच्चोन्द्रियशक्तिरप्रतिहिता यावत्त्वयो नायुषः ॥
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महा-
न्मोदीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ॥८८॥
कर्म बह मिर खि औ का हूं
जब तक शरीर ठीक हालतमें है, बुढ़ापा दूर है, इन्द्रियों की शक्ति बनी हुई है, आयुके दिन बाकी हैं, तभी तक बुद्धिमान को अपने कल्याणकी चेष्टा अच्छी तरह से कर लेनी चाहिये । घर जलने पर कूबों खोदने से क्या फायदा ? ॥८८॥
जब तक आपका शरीर निरोग और तन्दुरुस्त रहे, बुढ़ापा न आवे, आपको इन्द्रियोंकी शक्ति ठीक बनी रहे, आपका अन्त दूर हो, उम्र बाकी दीखे, तभी तक आप अपनी भलाई की चेष्टा कर लीजिये ; यानी ऐसी हालतमें ही भगवान्का भजन कर लीजिये । जब आप रोगसे जर्जरित हो जायेंगे,
( २६७ )
कफ-खाँसी और दम घेर लेंगे, आँखोंसे न दीखेगा, कानोंसे न सुनाई देगा, गलेमें घर-घर कफ बोलने लगेगा, मौत अपना पन्ना जमा देगी, तब आप क्या करेंगे ? अर्थात् कुछ नहीं । उस समय यदि आप कुछ करनेकी चेष्टा करेंगे भी, तो आपकी दशा उसकी सी होगी, जो घरमें आग लगने पर कूआ खोदता है ।
किसीने कहा है :—
प्रथमे नाजिता विद्या, द्वितीये नाजितं धनं ।
तृतीये नाजितं पुरयं, चतुर्थे किं करिष्यति ॥
बचपनमें यदि विद्या नहीं सीखी, जवानोंमें यदि धन सञ्चय नहीं किया, बुढ़ापेमें यदि पुण्य नहीं किया ; तो वौधेपनमें क्या करोगे ?
सबसे अच्छी बात तो बचपनमें ही परमात्मा की भक्ति करना है । भुव और प्रह्लादने बचपनमें ही भक्ति करके परमात्मके दर्शन किये थे । अगर इस उम्रमें न हो सके, तो जवानोंमें ; और जवानोंमें भी न हो सके तो बुढ़ापे में तो चूकना ही न चाहिये । खों-पुत्र धन-दौलत का मोह छोड़, परमात्मामें मन लगाओ ; आज-कल पर मत टालो ; क्योंकि मौत हर समय घातमें है, न जाने कब तुम्हें लेजाय । जब वह आजायगी, तब तुमसे कुछ करते-घरते न बनेगा, तुम घबरा जाओगे, मुह से परमात्माका नाम न निकलेगा और हाथोंसे दान या पराया उपकार न कर सकोगे । उस समय तुम्हारा परलोक
( २६८ )
बनाने की चेष्टा करना, आग लग जाने पर कुआँ खोदने वाले के समान मूर्खतापूर्ण काम होगा। अतः जो करना है, मरने के समयसे पहले ही करो। किसीने परलोक-साधनके लिये क्या अच्छी सलाह दी है :—
वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वदुष्टीयतां तेनैश्वर्यपिधीयतामपचितः कामे यतिसत्यज्यताम् ; पापीषः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयताम् ॥ आत्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात् तूर्थां विनिर्गम्यताम् ॥
नित्य वेद पढ़ो और वेदोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करो। वेद-विधिसे परमेश्वरकी पूजा करो। विषय-भोगोंको बुद्धिसे हटाओ ; यानी विषयोंको त्यागो। पाप-समूहका निवारण करो। संसारी सुख इन्-फुलेल-बन्दनादिके लगाने, ह्री-भोगने और नाच-गाना देखने-सुनने प्रभृतिका परिणाम विचारो ; यानी इनके दोषोंकी भावना करो। परमेश्वर या आत्मामें अनुराग करो और गृहस्थोंके अनेक दोषोंको समझ कर, शीघ्र ही घरको त्याग कर वनको चले जाओ।
उत्ताद् जौक कहते हैं—
• बेनिशों पहले फनासे हो, जो हो तुम्हको बका। • वनाँ है किसका निशों, जौके फनाने रक्खा ॥
मरनेसे पहले सांसारिक बन्धनोंसे अपने वित्तको हटा
( २६६ )
ले—अमर होनेको यही एक तरकीब है ; बर्ना मौत किसीका निशान नहीं छोड़ती ।
छप्पय ।
जों लौं देह निरोग, और जों लौं न जरा तन । अरु जों लौं बलवान् आयु, अरु इन्द्रिनके गन । तौं लौं निज कल्याण करन को, यल विचारत । वह पण्डित वह धीर वीर, जो प्रथम संहारत । फिर होता कहा जजीर भये, जप तप संयम नहि बनत । भव काम उठयौं निज भवन जब, तब क्योंकर कूपहि खनत ॥८८॥
88. As long as the body is in good health and old age is still far off, as long as the faculties of senses are strong and the end of life has not come, a wise man should try his best for his spiritual weal. When the house has caught fire what is the use of attempting to dig a well.
नाभ्यस्ता सुवि वादिश्वन्दमनी विद्या विनीतोचिता
खड्गाग्रैः करिकुम्भीठलनैर्नाकं न नीतं यशः
कान्ताकोमलपल्लवाधररसः पीतो न चन्द्रोदये
तारुण्यं गतमेव निष्फलमहो शून्यालयं दीप्तवत् ॥८९॥
हमने इस जगतमें नम्रोंको सन्तुष्ट करनेवाली और वादियोंका मान भञ्जन करनेवाली विद्या नहीं पढ़ी, तलवारकी धार से हार्थीके मस्तक का पिछला भाग काटकर अपना यश स्वर्ग तक नहीं
( ३०० )
पहुँचाया ; चौदनी रातमें सुन्दरीके कोमल अंधर-पल्लव (निचले होठ) का रस भी नहीं पिया। हाय ! हमारी जवानी सूने घरमें जलने वाले और आपही बुझ जाने वाले दीपककी तरह योंही गयी ॥८६॥
दोहा ।
थिया पढ़ी न रिपु दले, रहौ न नारि समीप ।
योगन यह योंही गयो, ज्यों सूने ग्रह दीप ॥८७॥
89, We did not attain in this world literary knowledge which pleases the meek and puts down the vanity of the crowds of critics, Nor did we extend our fame up to the gates of Swarga by cutting down the backs of elephants' heads with the edge of a sword. Nor did we drink in the moonlight the flowery juice of the soft lower lips of our beloved ones. Alas ! that our youth has passed away uselessly like a burning lamp in an empty house, which spends itself away without being of any use to anybody.
ज्ञानं सतां मानमदादिनाथनं
केषांचिदेतन्मदमानकारणम् ॥
स्थानं विचिक्तं यमिनां विमुक्तये
कामातुराणामतिकामकारणम् ॥८०॥
अच्छे मनुष्योंमें तो ज्ञान उनके मान-मद आदिका नाश करता है ; किन्तु दुष्टोंमें वही ज्ञान मान-मद प्रभृति योगुणोंकी वृद्धि करता है । एकान्त स्थान योगियोंके लिये तो मुक्ति दिलानेवाला
( ३०१ )
होता है ; किन्तु वही कामियों की कामञ्ज्वाला को बढ़ानेवाला होता है ॥६०॥
जिस तरह स्वाति-बूँद सीपमें पड़नेसे मोती और केहेमें कपूर हो जाती है, किन्तु सर्पमुखमें पड़नेसे विषका रूप धारण करती है ; उसी तरह एक हो चीज पुष्प-भेदसे अलग-अलग गुण दिखाती है। ज्ञानसे अच्छे लोगोंका अभिमान नाश हो जाता है, वे सब किसीको अपने बराबर समझते हैं, सबके साथ सहानुभूति रखते हैं, किसीका दिल नहीं दुखाते ; किन्तु उसी ज्ञानसे दुष्ट लोगोंकी दुष्टता और भी बढ़ जाती है, वे अपने सामने जगत्को तुच्छ समझते हैं ; विद्याभिमानके मारे किसीकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखते, अपने सिवा सबको पशु समझते हैं। एक ही ज्ञान दो स्थानोंमें स्थान-भेदसे अपना अलग-अलग प्रभाव दिखाता है। जैसे ; एकान्त स्थान योगियोंके चित्तको ब्रह्मविचारमें लीन करता है और इससे उनको परमपद-मुक्ति-मिल जाती है ; किन्तु वही एकान्त स्थान कामियोंके दिलोंमें मस्ती पैदा करता है।
दोहा ।
ज्ञान घटावै मान मद, ज्ञानहि देय बदाय ।
रहसि मुक्ति पावै यती, कामी रत लपटाय ॥६०॥
90 Knowledge serves the good men as a destroyer of their vanity and false pride. In some, it enhances the same evils.
इती (२)
एक
ग, के नु
( ३०२ )
A lonely place is for the spiritual salvation of those who practise self-restraint, while it increases hundredfold the lust of sensual people.
जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरां यौवनं हन्तागिषु गुणाश्च वध्यफलतां याता गुणवैर्बिना ॥
किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतांतोऽक्षमी
द्वाहातांस्मरशासनान्त्रिगुणं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ॥६१॥
हमारी इच्छायें हमारे हृदयमें ही जीर्ण हो गई, जवानी भी चली गई, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कुरददानीके न होनेसे बेकार हो गये, सर्वशक्तिमान् सर्वनाशक काल ( मृत्यु ) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है; इसलिये अब हमारी समझमें कामारि शिवके चरणोंके सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ॥६१॥
मनुष्य दुःखित होकर कहता है,—हमारे मनको मनमें ही रह गई, हमारे अर्मान न निकले, और जवानी कुछ कर गई; अब उसके आनेकी भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसीकी भी लौटकर आती सुनी नहीं।
मनुष्यकी तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक-पर-एक इच्छा उठा ही कसती है। इच्छायें पूरा नहीं होतीं और मौन आ जरती है। महाकवि गालिब भी पछता कर कहते हैं :—
हजारों स्वाहिरों ऐसी, कि हर स्वाहिस पै दम निकले। बहुत निकले मेरे अर्मान, लेकिन फिर भी कम निकले ॥
( ३०३ )
महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—
भरे हुए हैं हजारों असीं ।
फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।
कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।
मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।
मेरे मनमें हजारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूर्ण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है। हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया। अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—
तीनाहिं लोक अहार कियो सब ।
साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।
कादल आँख डरावत यानी ॥
दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।
या हिरा मैं यह डाकिनि जानी ॥
सुन्दर खात भये कितने दिन !
हे तृष्णा ! अजहू न अधानी ॥
इस तृष्णासे सभी समर्थद्वार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर ऐसी ही बातें कही हैं। इस तृष्णाके
( ३०२ )
A lonely place is for the spiritual salvation of those who practise self-restraint, while it increases hundredfold the lust of sensual people.
जीर्ण एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरां यौवनं हन्तंगिषु गुणारच वंध्यफलतां याता गुणैर्बिना ॥ किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतांतोऽचमी
ब्राह्मातंसंस्मरशासनांध्रियुगलं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ॥६१॥
हमारी इच्छायें हमारे हृदयमें ही जीर्ण हो गई, जवानी भी चली गई, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कुरददानोंके न होनेसे बेकार हो गये, सर्वशक्तिमान् सर्वनाशक काल ( मृत्यु ) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है ; इसलिये अब हमारी समझमें कामारि शिवके चरणोंके सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ॥६१॥
मनुष्य दुःखित होकर कहता है,—हमारे मनकी मनमें ही रह गई, हमारे अर्मान न निकले, और जवानी कूँच कर गई ; अब उसके आनेकी भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसीकी भी लौटकर आती सुनी नहीं ।
मनुष्यकी तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक-पर-एक इच्छा उठा ही कसती है । इच्छायें पूरो नहीं होतीं और मौन आ जाता है । महाकवि गाल्छिब भी पछता कर कहते हैं :—
हजारों स्वप्नहिशें ऐसी, कि हर स्वप्नहिश पै दम निकले । बहुत निकले झेरे अर्मान, लेकिन फिर भी कम निकले ॥
( ३०३ )
महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—
भरे हुए हैं हज़ारों अर्मी ।
फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।
कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।
मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।
मेरे मनमें हज़ारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है । हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया । अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—
तीनहिं लोक अहार कियो सब ।
साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।
कादत आँख डरावत यानी ॥
दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।
या हिरा मैं यह ढाकिन यानी ॥
सुन्दर खात भये कितने दिन !
हे तृष्णा ! अजहु न अधानी ॥
इस तृष्णासे सभी सर्मभ्दार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर पेसी हो बाते कही हैं । इस तृष्णाके
( ३०४ )
फेरमें मनुष्यका बुढ़ापा आ जाता है, पर तृष्णा बूढ़ी नहीं होती। बुढ़ापेमें उसका ज़ोर और भी बढ़ जाता है। यह तीनों लोकोंको खाकर और सातों सागरोंको पीकर भी नहीं धापती। इसलिये मनुष्यको आशा-तृष्णा त्यागकर, परमात्मामें लौ लगानी चाहिये। जो नहीं चेतते, उनका परिणाम बुरा होता है। जब एक दमसे बुढ़ापा छा जाता है, शरीर अशक्त हो जाता है, तब कुछ भी नहीं होता। उग्र स्वतम होने या मृत्यु आ जाने पर मनुष्य पछताता हुआ सबको छोड़ चला जाता है। कहा है—
ये मम देश विलायत हैं गज। ये मम मन्दिर ये मम धाती ॥ ये मम मात पिता पुनि बान्धव। ये मम पूत सु ये मम नाती ॥ ये मम कामिनि केलि करे नित। ये मम सेवक हैं दिन राती ॥ सुन्दर ऐसोहि क्वींडि गयेा सब। तेल जरयो सु बुम्भी जब बाती ॥
यह मेरा देश है, ये मेरे हाथी-घोड़े महल-सकान हैं, ये मेरे माँ-बाप और वन्धुबान्धव तथा नाती-पोते हैं, यह मेरी स्त्री और ये मेरे सेवक हैं; ऐसे करता-करता ही मनुष्य सबको छोड़कर चला जाता है। जिस तरह तेलके जल जानेपर दीपक बुझ जाता है; उसी तरह उग्र पूरी होनेपर मनुष्य मर जाता है। अतः ज्वानीमें ही स्त्री-पुत्र प्रभृति सबका
( ३०५ )
भोह छोड़, एकांतमें जा, परमात्माका भजन करना चाहिये ; क्योंकि बुढ़ापेमें कुछ नहीं हो सकता। शैल सादीने कहा है और ठीक कहा है:—
जवान गोशानशी, शेर मदें राहे खुदास्त ।
कि पीर खुद न तवानद, जे गोशये बरखास्त ॥
जवानोंमें जिन्होंने एकांतमें ईश्वर भजन किया है, सच्चे भक्त वेही हैं। बूढ़ा आदमी यदि एकांतवास पर गर्व करे तो भूटा है, क्योंकि वह तो जहाँ पड़ा है, वहाँसे सरक ही नहीं सकता ।
जो लोग सारी उग्र संसारी जंजालोंमें बिता देते हैं और परमात्माका भजन नहीं करते, उनका नक्शा स्वामी सुन्दर दासजीने खूब ही अच्छा खींचा है:—
धीव खचा कटि है लटकी ।
कचहूँ पलटे अजहूँ रतिबामी ॥
दन्त गये मुख के उखरे ।
नखरे न गये सुखो खर कामी ।
कम्पत देह सनेह सु दम्पति ।
सम्पति जंपत है निशि जामी ॥
सुन्दर अन्तहु मौन तज्यो ।
न भज्यो भगवन्त सु लौनहरामी ॥
२०
( ३०६ )
मनुष्यको गरदन हिलमे लगती है, खाल लटकने लगती है, कमर झुक जाता है, बाल खफेद हो जाते हैं, तोभी स्त्रीके साथ भोग करता है । मुँहके दाँत उखड़ जाते हैं, फिर भी कामी मनके नज़रे नहीं जाते, देह काँपती है; पर खीसे प्रीति रखता है और रात-दिन धनका जाप करता है । अन्तमें घर छोड़ता है, पर नमकहराम मालिकका भजन नहीं करता ।
लप्य ।
मनके मनहीं माँहि, मनोरथ वृद्ध भये सब । निज अंगनमें नाश भयो, वह यौवनहू अब । विद्या है गई बाँफ, बूझवारे नहीं दीसत । दौर्यों आवत काल, कोपकर दशनन पीसत । कवहूँ नहीं पूजे प्रीति सों, चक्रपाणि प्रभुके चरण । भवबन्धन काटे कौन अब, अजहूँ गहुरे हरि शरण ॥११॥
91. All our desires have been stifled within us. Our youth has been changed into old age. All our good qualities have resulted in fruitlessness through the absence of those who would appreciate them. The all-powerful Death, the destroyer of everything, is fast approaching. Now we have realised that there is no shelter for us, save that of the feet of Shiva, the enemy of Cupid.
तृषा शुष्यत्यास्ये पिवित् सलिलं स्वादु सुरभि जुषार्तः सञ्शालीन्कवलयति शाकादिवलितान् ।
( ३०७ )
पद्मोत्तम कामाग्नि सुदृढतरमारिलव्यति वर्ध प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ॥६२॥
जब मनुष्यका कष्ट प्यास से सूखने लगता है, तब वह शीतल जल पीता है ; जब उसे भूख लगती है, तब वह साग और कढ़ी प्रभृतिके साथ चोंवल खाता है ; जब उसकी कामाग्नि तेज होती है, तब वह स्त्री को जोर से गले लगाता है ; विचार कर देखनेसे मालूम होता है, कि ये सब बीमारियोंकी एक-एक दवा हैं ; परन्तु लोग इन्हें भूलसे सुखके समान मानते हैं ! ॥६२॥
प्यास रोगकी दवा शीतल जल है ; यानी शीतल जलसे तृष्णा नाश होती है । क्षुधा रोगकी दवा रोटी-भात और साम-दाल प्रभृति हैं ; यानी भात-दाल प्रभृतिसे भूख-रोग नाश होता है । कामाग्नि भी एक रोग है, उसके शान्त करनेका उपाय स्त्रीको छातीसे लगावा है, यानी स्त्रीका आलिकून करने या चिपटानेसे कामकी आग ठण्डी हो जाती है । ( दाह-उत्तरमें पोटुशी कामिनीके शरीरमें चन्दन लगाकर चिपटानेसे बहुत लाभ होता है । ) इन बातोंपर विचार करनेसे साफ मालूम होता है, कि शीतल जल-पान, मिष्ठ मिष्ठ प्रकारके भोजन और स्त्रियोंका आलिकून प्रभृति तृष्णा, क्षुधा और कामाग्नि प्रभृति रोगोंकी औषधियाँ हैं । इनको सुख समझना भूल नहीं तो क्या है ?
( ३०८ )
क्षपय ।
प्यास लगे जब पान करत, शीतल सुमिष्ट जल । भूख लगे तब खात, भात-श्रुत दूध और फल । बढत कामकी आगि, तबहि नववधू संग रति । ऐसे करत विलास, होत विपरीत दैव गति । सब जीव जगतके दिन भरत, खात पियत भोगहु करत । ये महारोग तीनों प्रबल, बिना मिटाये नहि मिटत ॥६२॥
92. When men's throats are overpowered by thirst, they drink clear and delicious water. When they are stricken with hunger, they eat rice together with curry made of vegetables etc. When the consuming fire of lust is kindled, they embrace closely their wives. Each of these actions is a remedy for a separate malady, but people take delight in them mistaking them for pleasures !
स्नात्वा गांभैः पयोभिः शुचिकुसुमफलैरर्चयित्वा विभो
त्वां ध्येये ध्यानं नियोज्य क्षितिश्चरकुहस्रावपर्थकमूले ॥
आत्मारामः फलाशी गुह्यचनरतस्तत्वसादात्मभरारे
दुःखान्मोक्ष्येकदाहं तव चरणस्तो ध्यानमागैर्कनिष्ठः ॥६३॥
हे शिव ! हे कामारि ! गंगा स्नान करके तुफ पर पवित्र फल- फूल चढ़ाता हुआ, तेरी पूजा करता हुआ, पर्वतकी गुफामें शिला पर बैठा हुआ, अपने ही आत्मामें मग्न होता हुआ, वन-फल खाता
( ३०६ )
दुःखा, गुरुकी आज्ञानुसार तेरे ही चरणोंका ध्यान करता हुआ कब मैं इन संसारी दुःखोंसे छुटकारा पाऊँगा ? ॥६३॥
दोहा
नरसेवा तजि, ब्रह्म भजि, गुरुचरण चित लाय ।
कब गंगातट ध्यान घर, पूजोंगो शिव पाय ? ॥६३॥
93. O Shiva, enemy of Cupid, when shall I be saved by Thy grace from the miseries of the world. bathing in the Ganges water, worshipping Thee with purified flowers and fruits, meditating on Thee as my idol, seated on a stone in a mountain cave, content with my own self, eating only wild fruits, obeying the commands of my religious preceptor, devoted to Thy feet and resolved to sit in contemplation as the only path to salvation ?
शय्या शैलशिला गृहं गिरिगुहा वम्भं तरुणां त्वचः
सारंगाः सुहृदो नख चितिरुहां इतिः फलैः कोमलैः ॥
येषां निर्फरम्बुपानसुचितं रत्येव विद्यांगना
मन्ये ते परमेश्वराः शिरसि यैवेद्विना न सेवाञ्जलिः ॥६४॥
मैं उनको परमेश्वर समझता हूँ, जो किसीके सामने मस्तक नहीं नवाते, जो पर्वतकी शिलाको ही अपनी शय्या समझते हैं, जो गुफा को ही अपना घर मानते हैं, जो वृक्षोंकी छालोंको ही अपने वस्त्र और जंगली हिरण्योंको ही अपने मित्र समझते हैं, वृक्षोंके कोमल फलोंसे ही उदरकी अग्रिको शान्त करते हैं, जो
पड़ती (२) ॥
कुच के अथ ना ना
एक
। ता, के रन्तु तत, रन्तु रना
र क क
कि क दे सके
वि क दे (
( ३१० )
कुदरती भरनों का जल पीते हैं और जो विद्याको ही अपनी प्राण-प्यारी समझते हैं ॥६४॥
जो किसी श्वाज्ञकी चाह नहीं रखते, वे किसी की परवा नहीं करते, वे किसीके सामने अस्तक नहीं नवाते ; जिनकी वासनाओंका अन्त नहीं होता, वे ही जने-जनेके सामने सिर झुकाते हैं । जो संसारके दास नहीं, वे सबमुच ही देवता हैं । उस्ताद जीकने कहा है:—
जिस इन्तों को सगे दुनिया न पाया ।
फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ॥
जो मनुष्य संसारका दास नहीं—संसारका कुत्ता नहीं— वह देवताओंसे कहीं ऊँचा है । देवता उसकी बराबरी नहीं कर सकते । जिसमें सांसारिक वासनाओंका लेश न हो, उस मनुष्य और देवताओंमें कोई भेद नहीं ।
सच्चे महात्मा बन और पर्वतोंको छोड़कर दुनियामें कभी नहीं आते ; वे माँगकर नहीं खाते ; उन्हें वनमें ही जो कुछ मिल जाता है, वही खा लेते हैं ।
महाकवि गालिब कहते हैं:—
वे तलब दें, तो सब उसमें सिवा मिलता है ।
वह गदा, जिसका न हो खूबे सवाल अच्छा है ॥
बिना माँगि मिल जानेमें बड़ा आनन्द है । फकीर वही अच्छा जिसमें माँगनेकी आदत न हो ।