वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३१० )
कुदरती भरनों का जल पीते हैं और जो विद्याको ही अपनी प्राण-प्यारी समझते हैं ॥६४॥
जो किसी श्वाज्ञकी चाह नहीं रखते, वे किसी की परवा नहीं करते, वे किसीके सामने अस्तक नहीं नवाते ; जिनकी वासनाओंका अन्त नहीं होता, वे ही जने-जनेके सामने सिर झुकाते हैं । जो संसारके दास नहीं, वे सबमुच ही देवता हैं । उस्ताद जीकने कहा है:—
जिस इन्तों को सगे दुनिया न पाया ।
फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ॥
जो मनुष्य संसारका दास नहीं—संसारका कुत्ता नहीं— वह देवताओंसे कहीं ऊँचा है । देवता उसकी बराबरी नहीं कर सकते । जिसमें सांसारिक वासनाओंका लेश न हो, उस मनुष्य और देवताओंमें कोई भेद नहीं ।
सच्चे महात्मा बन और पर्वतोंको छोड़कर दुनियामें कभी नहीं आते ; वे माँगकर नहीं खाते ; उन्हें वनमें ही जो कुछ मिल जाता है, वही खा लेते हैं ।
महाकवि गालिब कहते हैं:—
वे तलब दें, तो सब उसमें सिवा मिलता है ।
वह गदा, जिसका न हो खूबे सवाल अच्छा है ॥
बिना माँगि मिल जानेमें बड़ा आनन्द है । फकीर वही अच्छा जिसमें माँगनेकी आदत न हो ।