भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 420

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और भी कहा है:—

दस्ते सवालें, सैकड़ों ऐबोंका ऐब है । जित दस्तमें यह ऐब नहीं, वह दस्ते गँव है ॥

कबीर साहबने भी कहा है:—

अनमीया उतम कहो, मध्यम माँगि जो लेय । कहे कबीर निछछ तो, पर घर धरना देय ॥ उत्तम भीख जो अजगरी, सुनि लीजो निज वैन । कहे कबीर ताके गहे, महा परम सुख चैन ॥

महापुरुष भगवान् के भरोसे रहते हैं, इसलिये उन्हें उनकी झरतकी चीज़ उनके स्नानपर ही मिल जाती हैं। वे संसार कृपी काजलकी कोठरीमें आकर कालिख लगाना पसन्द नहीं करते। संसारी लोगोंके साथ मिलने-जुलनेमें भलाई नहीं। संसारसे दूर रहना ही भला। क्योंकि मनुष्य जैसे आदमियों को देखता और जैसोंकी संगति करता है, वैसा ही हो जाता है। रागियोंकी संगतसे वैरागी भी रागी या विषय-भोगी हो जाता है। जल और वृक्षोंके पत्ते खानेवाले ऋषि स्त्रियों के देखने-मानसे अपने तपसे हीन हो गये। इसीलिये शास्त्रोंमें लिखा है कि, सन्यासी संसारियोंसे दूर रहे। वास्तविक महापुरुष जो सच्चे ब्रह्मज्ञानी या रासायनिक हैं; किसी के भी द्वारपर नहीं जाते। जिसे कुछ कामना होती है; वही किसीके द्वारपर जाता है। कामनाहीन पुरुष कभी किसी

इती (२)

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