भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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के पास नहीं जाता। सच्चे महात्मा सँसारियोंसे अपनी जान छिपाते हैं।

दो महात्मा जो राजासे मिलना नहीं चाहते थे।

एक नगरके बाहर बनमें दो बड़े ही त्यागी महात्मा रहते थे। राजाने चाहा कि, मैं उनसे मिलूँ। राजा अपने परिवार सहित उनसे मिलने गया। महात्माओंने सोचा—यह तो बुरी बला लगी। इसे सदाको टालना चाहिये। आज यह आया है, कल नगर भर आवेगा। फिर हम तो भजन ही न कर सकेंगे। जब राजा पास पहुँचा, तो वे आपसमें लड़ने लगे। एक कहने लगा,—“तने मेरी रोटी खाली।” दूसरे ने कहा—“तुने भी तो कल मेरी खा ली थी।” यह हाल देखकर राजाको घृणा हो गई और वह लौट आया। इस तरह महात्माओंके एकान्तवासमें विघ्न न पड़ा।

सँसारियों की संगति बुरी।

एक महात्मा कहींसे आकर आशीर्में रह गये। दस पाँच वर्ष बाद अनेक लोग उन्हें जान गये और उन्हें अपने-अपने घर