भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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भोजनके लिये ले जाने लगे । महात्माने देखा कि, घरोंमें जानेसे विश्लेष होता है, इसलिये उन्होंने अपनी लंगोटोही उतारकर पैक दी, कि नंगे रहनेसे लोग घरोंपर न ले जायेंगे । पर फल उल्टा हुआ, उनकी महिमा और भी बढ़ गई । अब तो बड़े-बड़े राजा, रईस और ज़मानदार उनके दर्शनों को आने लगे । उनका सारा समय अमीरोंसे मिलनेमें ही बीतने लगा । इतनेमें एक और महात्मा आये और उनसे एकान्त में पूछा—“क्या हाल है ?” महात्माने कहा—“बवासीरसे मरते हैं ।” आगन्तुक महात्माने कहा—“लोग तो आपको खिन्न कहते हैं ।” महात्माने कहा—“कहा करें, लोग मूर्ख हैं । हमारे चित्तमें तो वासनायेँ भरी हैं, न जाने हमें किस योनियें जन्म लेना होगा हमारा तो सारा वेराग्य इन धनियों की संगतिमें ही नष्ट हो गया ।” सब है, निवृत्ति-मार्गवालोंको प्रवृत्ति मार्गवालोंकी संगति करना अच्छा नहीं ।

छप्पय ।

वसैं गुहागिरि, शुचित शिला शय्या मनमानी । वृक्षवकलके वसन, स्वच्छ सुरसरिको पानी ॥ वनमृग जिनके मित्र, वृक्षफल भोजन जिनके । विद्या जिनकी नारि, नहीं सुरपति सभ तिनके । ते लगत ईश सभ मनुज मोहि, तनुशुचित ऐसे जग भये । जे पर सेवा के काजको, हाथ नाहि जोरत नए ॥६४॥