भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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94. I think such persons are only affluent who do not bow their heads to any one, who make a mountain stone their bed, a cave their home, the bark of trees their clothes, the wild deer their friends and the soft fruits of wild trees their food, who drink the water coming out of natural springs and who consider knowledge only to be their beloved wife.

सत्याभेव त्रिलोकीसरिति हरशिररबुम्बिनीवच्छटायां सद्गृत्तिं कल्पयन्त्यांवटविटपिभैर्वैरुक्तैः सत्फलैरच । कोऽयं विद्वान् विपत्तिन्म्वरजन्तिरुजातीव दुःखासिकांनावचनं वीक्षेत दुःस्थे यदि हि न विमुपात्स्ये कुटुम्बेऽनुकम्पाम् ॥६५॥

जबकि गंगा, जो शिवजीके मस्तकको चूमती हुई भली मालूम होती है, वङ्गकी डालियोंकी छालों और अपने तट पर लगे हुए फलोंसे आदमीका गुजारा करनेका तैयार है, तब कौन विद्वान् या ज्ञानी, यदि दुःखित कुटुम्बियों पर दया न आती तो, कंगालीकी मुसीबतोंसे आह भरती हुई—दुःखसे गहरे सौंस लेती हुई—जो का मुख देखना चाहता ? ॥६५॥

मतलब यह है कि, पुस्तकको किसी प्रकारका भी दुःख उठाने की जरूरत नहीं, उसे रंगा ही सब कुछ देने को तैयार है। वह गङ्गाजल पीकर और उसके किनारे पर उगे हुए वनफल खाकर और वटवृक्षकी छालों के कपड़े पहन कर गुजारा कर सकता है, पर ली के कारण वह ऐसा कर नहीं सकता। सारांश यह कि, सब दुखोंकी मूल ली है। यदि