वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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कुटुम्ब-वृद्धिकी जरूरत न हो, तो स्त्री की दूरकार नहीं, और यदि स्त्री न हो तो फिर दुःख ही क्या ? लोगोंकी खुशामद करने, जने-जने की लछोपसो करने, दुष्टों के कटुवचन सुनने को स्त्री ही मजबूर करती है । दया के मारे पुरुषसे उसका और उसके बच्चोंका कष्ट देखा नहीं जाता ।
व्यपय ।
सोहत जो शिवसीस, जटा सुरसरिकी धारा । बटतर बरकल फूल, जासु सदवृत्ति अपारा ॥ त्याग सुखद अस गंग, कौन ऐसो नर वो है । परिजन करणार्होन, नारिको आनन जोहै ॥ दीर्घ शवाससों विपत्तिचर, जीरण भारी गहतु है । सब विधि यह दुखकी स्नान, यति निर्दय जेहि लिय कहतु है ॥६५॥
95. When the Ganges which looks beautiful in her action of kissing the Shiva's head, is ready to supply a livelihood by offering the bark of banyan trees and good fruits growing on her banks, what wise man would care to look at the face of a wife heaving deep sighs of distress caused by extreme poverty, were it not for kindness towards the afflicted members of his family ?
उवानेषु विचित्रभोजनविधिस्तौत्रातितीर्णं तपः कौपीनावरणं सुवस्त्रमभितं भिक्षाटनं यगडनय ॥ आसनं मरणं च मंगलममं यत्सो समुत्पद्यते तां कार्शी परिहृत्य हन्त विवृधैरन्यत्र किं स्वीयते ॥६६॥