वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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आश्चर्य्यकी बात है, कि लोग काशी छोड़कर और जगह क्यों बसते हैं, जहाँ उपवनोमें नाना प्रकारके भोजन बनाकर खाना ही कठिन तप है, जहाँ लंगोटी पहनना ही बढ़िया कपड़ा है, जहाँ भीख माँगना ही प्रतिष्ठा है और जहाँ मौत का आना ही परम मंगल समझा जाता है ? ॥६६॥
लोगोंका ख्याल है, कि जो काशी में मरता है, उसकी मोक्ष हो जाती है ; इसीसे अनेक लोग वृद्धावस्था आते ही सब को छोड़ काशीमें जा बसते हैं । वहाँ मौत से कोई नहीं डरता ; वहाँकी मृत्युको लोग परम शान्तिदायिनी समझते हैं * । वहाँ कोपीन लगाकर भीख माँगने वाले बुढ़ी नज़र से नहीं देखे जाते, इसलिप लोगोंको काशी-वास करना चाहिये ।
कुण्डलिया ।
काशीमें जहाँ शिव बसत, बैठ तासु उद्यान । विविध अशन सम तप नहीं, देख्यौ उग्र महान ॥ देख्यौ उग्र महान, भीख जहाँ सुन्दर भूषण । खण्ड एक कोपीन, वसन बहुमूल्य अदूषण । मरणहि मंगलकरण, मिलै जहाँ हर आविनाशी । को ऐसो विद्वान, तजै जो ऐसी काशी ? ॥६६॥
☸ आज-कल भी इस ख्यालके लोग बहुत हैं, पर पहले जितनी महिमा अब नहीं । जो आत्मज्ञानी हैं, वे तीथों में नहीं जाते ; क्योंकि स्वयं