वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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दुःखा, गुरुकी आज्ञानुसार तेरे ही चरणोंका ध्यान करता हुआ कब मैं इन संसारी दुःखोंसे छुटकारा पाऊँगा ? ॥६३॥
दोहा
नरसेवा तजि, ब्रह्म भजि, गुरुचरण चित लाय ।
कब गंगातट ध्यान घर, पूजोंगो शिव पाय ? ॥६३॥
93. O Shiva, enemy of Cupid, when shall I be saved by Thy grace from the miseries of the world. bathing in the Ganges water, worshipping Thee with purified flowers and fruits, meditating on Thee as my idol, seated on a stone in a mountain cave, content with my own self, eating only wild fruits, obeying the commands of my religious preceptor, devoted to Thy feet and resolved to sit in contemplation as the only path to salvation ?
शय्या शैलशिला गृहं गिरिगुहा वम्भं तरुणां त्वचः
सारंगाः सुहृदो नख चितिरुहां इतिः फलैः कोमलैः ॥
येषां निर्फरम्बुपानसुचितं रत्येव विद्यांगना
मन्ये ते परमेश्वराः शिरसि यैवेद्विना न सेवाञ्जलिः ॥६४॥
मैं उनको परमेश्वर समझता हूँ, जो किसीके सामने मस्तक नहीं नवाते, जो पर्वतकी शिलाको ही अपनी शय्या समझते हैं, जो गुफा को ही अपना घर मानते हैं, जो वृक्षोंकी छालोंको ही अपने वस्त्र और जंगली हिरण्योंको ही अपने मित्र समझते हैं, वृक्षोंके कोमल फलोंसे ही उदरकी अग्रिको शान्त करते हैं, जो
पड़ती (२) ॥
कुच के अथ ना ना
एक
। ता, के रन्तु तत, रन्तु रना
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कि क दे सके
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