वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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क्षपय ।
प्यास लगे जब पान करत, शीतल सुमिष्ट जल । भूख लगे तब खात, भात-श्रुत दूध और फल । बढत कामकी आगि, तबहि नववधू संग रति । ऐसे करत विलास, होत विपरीत दैव गति । सब जीव जगतके दिन भरत, खात पियत भोगहु करत । ये महारोग तीनों प्रबल, बिना मिटाये नहि मिटत ॥६२॥
92. When men's throats are overpowered by thirst, they drink clear and delicious water. When they are stricken with hunger, they eat rice together with curry made of vegetables etc. When the consuming fire of lust is kindled, they embrace closely their wives. Each of these actions is a remedy for a separate malady, but people take delight in them mistaking them for pleasures !
स्नात्वा गांभैः पयोभिः शुचिकुसुमफलैरर्चयित्वा विभो
त्वां ध्येये ध्यानं नियोज्य क्षितिश्चरकुहस्रावपर्थकमूले ॥
आत्मारामः फलाशी गुह्यचनरतस्तत्वसादात्मभरारे
दुःखान्मोक्ष्येकदाहं तव चरणस्तो ध्यानमागैर्कनिष्ठः ॥६३॥
हे शिव ! हे कामारि ! गंगा स्नान करके तुफ पर पवित्र फल- फूल चढ़ाता हुआ, तेरी पूजा करता हुआ, पर्वतकी गुफामें शिला पर बैठा हुआ, अपने ही आत्मामें मग्न होता हुआ, वन-फल खाता