भारतकोश
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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ३०८ )

क्षपय ।

प्यास लगे जब पान करत, शीतल सुमिष्ट जल । भूख लगे तब खात, भात-श्रुत दूध और फल । बढत कामकी आगि, तबहि नववधू संग रति । ऐसे करत विलास, होत विपरीत दैव गति । सब जीव जगतके दिन भरत, खात पियत भोगहु करत । ये महारोग तीनों प्रबल, बिना मिटाये नहि मिटत ॥६२॥

92. When men's throats are overpowered by thirst, they drink clear and delicious water. When they are stricken with hunger, they eat rice together with curry made of vegetables etc. When the consuming fire of lust is kindled, they embrace closely their wives. Each of these actions is a remedy for a separate malady, but people take delight in them mistaking them for pleasures !

स्नात्वा गांभैः पयोभिः शुचिकुसुमफलैरर्चयित्वा विभो

त्वां ध्येये ध्यानं नियोज्य क्षितिश्चरकुहस्रावपर्थकमूले ॥

आत्मारामः फलाशी गुह्यचनरतस्तत्वसादात्मभरारे

दुःखान्मोक्ष्येकदाहं तव चरणस्तो ध्यानमागैर्कनिष्ठः ॥६३॥

हे शिव ! हे कामारि ! गंगा स्नान करके तुफ पर पवित्र फल- फूल चढ़ाता हुआ, तेरी पूजा करता हुआ, पर्वतकी गुफामें शिला पर बैठा हुआ, अपने ही आत्मामें मग्न होता हुआ, वन-फल खाता

( ३०६ )

दुःखा, गुरुकी आज्ञानुसार तेरे ही चरणोंका ध्यान करता हुआ कब मैं इन संसारी दुःखोंसे छुटकारा पाऊँगा ? ॥६३॥

दोहा

नरसेवा तजि, ब्रह्म भजि, गुरुचरण चित लाय ।

कब गंगातट ध्यान घर, पूजोंगो शिव पाय ? ॥६३॥

93. O Shiva, enemy of Cupid, when shall I be saved by Thy grace from the miseries of the world. bathing in the Ganges water, worshipping Thee with purified flowers and fruits, meditating on Thee as my idol, seated on a stone in a mountain cave, content with my own self, eating only wild fruits, obeying the commands of my religious preceptor, devoted to Thy feet and resolved to sit in contemplation as the only path to salvation ?

शय्या शैलशिला गृहं गिरिगुहा वम्भं तरुणां त्वचः

सारंगाः सुहृदो नख चितिरुहां इतिः फलैः कोमलैः ॥

येषां निर्फरम्बुपानसुचितं रत्येव विद्यांगना

मन्ये ते परमेश्वराः शिरसि यैवेद्विना न सेवाञ्जलिः ॥६४॥

मैं उनको परमेश्वर समझता हूँ, जो किसीके सामने मस्तक नहीं नवाते, जो पर्वतकी शिलाको ही अपनी शय्या समझते हैं, जो गुफा को ही अपना घर मानते हैं, जो वृक्षोंकी छालोंको ही अपने वस्त्र और जंगली हिरण्योंको ही अपने मित्र समझते हैं, वृक्षोंके कोमल फलोंसे ही उदरकी अग्रिको शान्त करते हैं, जो

पड़ती (२) ॥

कुच के अथ ना ना

एक

। ता, के रन्तु तत, रन्तु रना

र क क

कि क दे सके

वि क दे (

( ३१० )

कुदरती भरनों का जल पीते हैं और जो विद्याको ही अपनी प्राण-प्यारी समझते हैं ॥६४॥

जो किसी श्वाज्ञकी चाह नहीं रखते, वे किसी की परवा नहीं करते, वे किसीके सामने अस्तक नहीं नवाते ; जिनकी वासनाओंका अन्त नहीं होता, वे ही जने-जनेके सामने सिर झुकाते हैं । जो संसारके दास नहीं, वे सबमुच ही देवता हैं । उस्ताद जीकने कहा है:—

जिस इन्तों को सगे दुनिया न पाया ।

फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ॥

जो मनुष्य संसारका दास नहीं—संसारका कुत्ता नहीं— वह देवताओंसे कहीं ऊँचा है । देवता उसकी बराबरी नहीं कर सकते । जिसमें सांसारिक वासनाओंका लेश न हो, उस मनुष्य और देवताओंमें कोई भेद नहीं ।

सच्चे महात्मा बन और पर्वतोंको छोड़कर दुनियामें कभी नहीं आते ; वे माँगकर नहीं खाते ; उन्हें वनमें ही जो कुछ मिल जाता है, वही खा लेते हैं ।

महाकवि गालिब कहते हैं:—

वे तलब दें, तो सब उसमें सिवा मिलता है ।

वह गदा, जिसका न हो खूबे सवाल अच्छा है ॥

बिना माँगि मिल जानेमें बड़ा आनन्द है । फकीर वही अच्छा जिसमें माँगनेकी आदत न हो ।

( ३११ )

और भी कहा है:—

दस्ते सवालें, सैकड़ों ऐबोंका ऐब है । जित दस्तमें यह ऐब नहीं, वह दस्ते गँव है ॥

कबीर साहबने भी कहा है:—

अनमीया उतम कहो, मध्यम माँगि जो लेय । कहे कबीर निछछ तो, पर घर धरना देय ॥ उत्तम भीख जो अजगरी, सुनि लीजो निज वैन । कहे कबीर ताके गहे, महा परम सुख चैन ॥

महापुरुष भगवान् के भरोसे रहते हैं, इसलिये उन्हें उनकी झरतकी चीज़ उनके स्नानपर ही मिल जाती हैं। वे संसार कृपी काजलकी कोठरीमें आकर कालिख लगाना पसन्द नहीं करते। संसारी लोगोंके साथ मिलने-जुलनेमें भलाई नहीं। संसारसे दूर रहना ही भला। क्योंकि मनुष्य जैसे आदमियों को देखता और जैसोंकी संगति करता है, वैसा ही हो जाता है। रागियोंकी संगतसे वैरागी भी रागी या विषय-भोगी हो जाता है। जल और वृक्षोंके पत्ते खानेवाले ऋषि स्त्रियों के देखने-मानसे अपने तपसे हीन हो गये। इसीलिये शास्त्रोंमें लिखा है कि, सन्यासी संसारियोंसे दूर रहे। वास्तविक महापुरुष जो सच्चे ब्रह्मज्ञानी या रासायनिक हैं; किसी के भी द्वारपर नहीं जाते। जिसे कुछ कामना होती है; वही किसीके द्वारपर जाता है। कामनाहीन पुरुष कभी किसी

इती (२)

कुच- के स अर्थ नाम नाम

एक

रम यो

( ३१२ )

के पास नहीं जाता। सच्चे महात्मा सँसारियोंसे अपनी जान छिपाते हैं।

दो महात्मा जो राजासे मिलना नहीं चाहते थे।

एक नगरके बाहर बनमें दो बड़े ही त्यागी महात्मा रहते थे। राजाने चाहा कि, मैं उनसे मिलूँ। राजा अपने परिवार सहित उनसे मिलने गया। महात्माओंने सोचा—यह तो बुरी बला लगी। इसे सदाको टालना चाहिये। आज यह आया है, कल नगर भर आवेगा। फिर हम तो भजन ही न कर सकेंगे। जब राजा पास पहुँचा, तो वे आपसमें लड़ने लगे। एक कहने लगा,—“तने मेरी रोटी खाली।” दूसरे ने कहा—“तुने भी तो कल मेरी खा ली थी।” यह हाल देखकर राजाको घृणा हो गई और वह लौट आया। इस तरह महात्माओंके एकान्तवासमें विघ्न न पड़ा।

सँसारियों की संगति बुरी।

एक महात्मा कहींसे आकर आशीर्में रह गये। दस पाँच वर्ष बाद अनेक लोग उन्हें जान गये और उन्हें अपने-अपने घर

( ३१३ )

भोजनके लिये ले जाने लगे । महात्माने देखा कि, घरोंमें जानेसे विश्लेष होता है, इसलिये उन्होंने अपनी लंगोटोही उतारकर पैक दी, कि नंगे रहनेसे लोग घरोंपर न ले जायेंगे । पर फल उल्टा हुआ, उनकी महिमा और भी बढ़ गई । अब तो बड़े-बड़े राजा, रईस और ज़मानदार उनके दर्शनों को आने लगे । उनका सारा समय अमीरोंसे मिलनेमें ही बीतने लगा । इतनेमें एक और महात्मा आये और उनसे एकान्त में पूछा—“क्या हाल है ?” महात्माने कहा—“बवासीरसे मरते हैं ।” आगन्तुक महात्माने कहा—“लोग तो आपको खिन्न कहते हैं ।” महात्माने कहा—“कहा करें, लोग मूर्ख हैं । हमारे चित्तमें तो वासनायेँ भरी हैं, न जाने हमें किस योनियें जन्म लेना होगा हमारा तो सारा वेराग्य इन धनियों की संगतिमें ही नष्ट हो गया ।” सब है, निवृत्ति-मार्गवालोंको प्रवृत्ति मार्गवालोंकी संगति करना अच्छा नहीं ।

छप्पय ।

वसैं गुहागिरि, शुचित शिला शय्या मनमानी । वृक्षवकलके वसन, स्वच्छ सुरसरिको पानी ॥ वनमृग जिनके मित्र, वृक्षफल भोजन जिनके । विद्या जिनकी नारि, नहीं सुरपति सभ तिनके । ते लगत ईश सभ मनुज मोहि, तनुशुचित ऐसे जग भये । जे पर सेवा के काजको, हाथ नाहि जोरत नए ॥६४॥

( ३१४ )

94. I think such persons are only affluent who do not bow their heads to any one, who make a mountain stone their bed, a cave their home, the bark of trees their clothes, the wild deer their friends and the soft fruits of wild trees their food, who drink the water coming out of natural springs and who consider knowledge only to be their beloved wife.

सत्याभेव त्रिलोकीसरिति हरशिररबुम्बिनीवच्छटायां सद्गृत्तिं कल्पयन्त्यांवटविटपिभैर्वैरुक्तैः सत्फलैरच । कोऽयं विद्वान् विपत्तिन्म्वरजन्तिरुजातीव दुःखासिकांनावचनं वीक्षेत दुःस्थे यदि हि न विमुपात्स्ये कुटुम्बेऽनुकम्पाम् ॥६५॥

जबकि गंगा, जो शिवजीके मस्तकको चूमती हुई भली मालूम होती है, वङ्गकी डालियोंकी छालों और अपने तट पर लगे हुए फलोंसे आदमीका गुजारा करनेका तैयार है, तब कौन विद्वान् या ज्ञानी, यदि दुःखित कुटुम्बियों पर दया न आती तो, कंगालीकी मुसीबतोंसे आह भरती हुई—दुःखसे गहरे सौंस लेती हुई—जो का मुख देखना चाहता ? ॥६५॥

मतलब यह है कि, पुस्तकको किसी प्रकारका भी दुःख उठाने की जरूरत नहीं, उसे रंगा ही सब कुछ देने को तैयार है। वह गङ्गाजल पीकर और उसके किनारे पर उगे हुए वनफल खाकर और वटवृक्षकी छालों के कपड़े पहन कर गुजारा कर सकता है, पर ली के कारण वह ऐसा कर नहीं सकता। सारांश यह कि, सब दुखोंकी मूल ली है। यदि

( ३१५ )

कुटुम्ब-वृद्धिकी जरूरत न हो, तो स्त्री की दूरकार नहीं, और यदि स्त्री न हो तो फिर दुःख ही क्या ? लोगोंकी खुशामद करने, जने-जने की लछोपसो करने, दुष्टों के कटुवचन सुनने को स्त्री ही मजबूर करती है । दया के मारे पुरुषसे उसका और उसके बच्चोंका कष्ट देखा नहीं जाता ।

व्यपय ।

सोहत जो शिवसीस, जटा सुरसरिकी धारा । बटतर बरकल फूल, जासु सदवृत्ति अपारा ॥ त्याग सुखद अस गंग, कौन ऐसो नर वो है । परिजन करणार्होन, नारिको आनन जोहै ॥ दीर्घ शवाससों विपत्तिचर, जीरण भारी गहतु है । सब विधि यह दुखकी स्नान, यति निर्दय जेहि लिय कहतु है ॥६५॥

95. When the Ganges which looks beautiful in her action of kissing the Shiva's head, is ready to supply a livelihood by offering the bark of banyan trees and good fruits growing on her banks, what wise man would care to look at the face of a wife heaving deep sighs of distress caused by extreme poverty, were it not for kindness towards the afflicted members of his family ?

उवानेषु विचित्रभोजनविधिस्तौत्रातितीर्णं तपः कौपीनावरणं सुवस्त्रमभितं भिक्षाटनं यगडनय ॥ आसनं मरणं च मंगलममं यत्सो समुत्पद्यते तां कार्शी परिहृत्य हन्त विवृधैरन्यत्र किं स्वीयते ॥६६॥

( ३२६ )

आश्चर्य्यकी बात है, कि लोग काशी छोड़कर और जगह क्यों बसते हैं, जहाँ उपवनोमें नाना प्रकारके भोजन बनाकर खाना ही कठिन तप है, जहाँ लंगोटी पहनना ही बढ़िया कपड़ा है, जहाँ भीख माँगना ही प्रतिष्ठा है और जहाँ मौत का आना ही परम मंगल समझा जाता है ? ॥६६॥

लोगोंका ख्याल है, कि जो काशी में मरता है, उसकी मोक्ष हो जाती है ; इसीसे अनेक लोग वृद्धावस्था आते ही सब को छोड़ काशीमें जा बसते हैं । वहाँ मौत से कोई नहीं डरता ; वहाँकी मृत्युको लोग परम शान्तिदायिनी समझते हैं * । वहाँ कोपीन लगाकर भीख माँगने वाले बुढ़ी नज़र से नहीं देखे जाते, इसलिप लोगोंको काशी-वास करना चाहिये ।

कुण्डलिया ।

काशीमें जहाँ शिव बसत, बैठ तासु उद्यान । विविध अशन सम तप नहीं, देख्यौ उग्र महान ॥ देख्यौ उग्र महान, भीख जहाँ सुन्दर भूषण । खण्ड एक कोपीन, वसन बहुमूल्य अदूषण । मरणहि मंगलकरण, मिलै जहाँ हर आविनाशी । को ऐसो विद्वान, तजै जो ऐसी काशी ? ॥६६॥

☸ आज-कल भी इस ख्यालके लोग बहुत हैं, पर पहले जितनी महिमा अब नहीं । जो आत्मज्ञानी हैं, वे तीथों में नहीं जाते ; क्योंकि स्वयं

इती (२)

एक

ता, के नु व

द्वैरायशतक ३४

अरे मूले ! विश्वेग की शरण में क्यों नहीं जाता, जिनके द्वार पर रोकनेवाले दरवान नहीं हैं । जहाँ निर्दय और कठोर बच्चनों का नाम भी नहीं है ?

( ३१७ )

96 It is a wonder why wise men like to take up their abode in any other place than Kashi ; where partaking of different kinds of eatables in gardens is the most austere penance, where the wearing of a narrow strip of loin-cloth is considered as respectable dress, where unrestricted wandering beggary is thought to be honourable and where the near approach of death is looked upon as bringing everlasting bliss !

नायते सम्यो रहस्यमधुना निद्राति नाथो यदि

स्थित्वा ऋच्यति कुप्यति प्रसुरिति द्वारेषु येषां वचः

चेतस्तानपहाय याहि भवनं देवस्य विश्वेश्वरिभु-

निर्दौवारिकनिर्दयोक्त्यपरुषं निःसीमशर्मप्रदम् ॥६७॥

हे मन ! जिनके द्वार पर,—“मालिक मकानसे मिलनेका समय नहीं है, वे इस समय एकान्तमें बैठे हैं, वे इस वक्त सो रहे हैं, अगर तुम्हें यहाँ खड़ा देखेंगे तो नाराज़ होंगे”—ऐसी बातें सुनाई देती हैं, उनको त्याग कर विश्वेश्वर की शरण में जा, जिनके द्वार पर रोकनेवाला दरवान नहीं, जहाँ निर्दय और कठोर बचन कभी सुननेमें नहीं आते, जो अनन्त और नित्य सुखके देनेवाले हैं ॥६७॥

मूर्ख मनुष्य, ना-सप्रभोके कारण, वृथा अमीरों के दरवाजे पर जाता है और अपमानसूचक बाते सुनता है ; जिनके यह

परमात्मा उनके हृदय-कमल में मौजूद है। हाँ, जो अज्ञानी हैं, वे ही तीथवास करते और तीर्थमें शरीर त्यागना चाहते हैं।

( ३१८ )

जाता है उनसे मिलने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करता है, दरबानोंको तरह-तरहको बेदङ्गों बातें सुनता है । अगर वह कुछ भी अङ्कसे काम ले, तो उसे उसके द्वार पर जाना चाहिये, जहाँ कोई रोकने वाला नहीं, जहाँ दिल दुखानेवाली बातोंका नाम भी नहीं, जो खारे संसारका स्वामी और नित्य सुख के देने वाला है । वह क्या उसकी इच्छा पूरी न करेगा ? अवश्य पूरी करेगा । जो बिना जड़ की अमरबेलको पोषता है, उसे छोड़कर और को खोजना भूलकी बात है । रहीम कवि कहते हैं :—

अमरबेलि बिन मूलकी, प्रतिपालत है ताहि । “रहिमन” ऐसे प्रभुहि तजि, खोजत फिरिये काहि ॥

रहीम कवि कहते हैं, जो प्रभु बिना मूल की अमरबेल की प्रतिपालना करता है, ऐसे प्रभु को छोड़कर किसे खोजते फिरें ?

और भी—

( ? )

जा दिनतें गर्भवास तज्यो नर ।

आइ आहार लियो तवही को ॥

खाताहि खात भये इतने दिन ।

जानत नाहि न भूल कहीं को ॥

( ३१६ )

दौरत धावत पेट दिखावत ।

तू शठ कीट सदा अनही को ॥

सुन्दर क्यूँ विश्वास न राखत ? ।

सो प्रभु विश्व भरे सब ही को ॥

( २ )

सेवर भूचर जे जलके चर ।

देत आहार चराचर पोवे ।

वे हरि जो सब कूँ प्रतिपालत ।

ज्यूँ जिहि भौति तिसी विधि तोषै ॥

तू अब क्यूँ विश्वास न राखत ? ।

भूलत है कित धोखहि धोखै ॥

तोहि तहाँ पहुँचाय रहे प्रभु ।

सुन्दर बैठि रहै कित खोखै ॥

ईश्वरकी शरणमें जानेसे अभाव नहीं रहता ।

—*—

एक राजा बड़ा आलसो और विषयी था । वह राज-काज को अरा भी न देखता था । सारा भार वज्रौर के लिए पर था । वज्रौर यदि किसी ज़रूरी कामकी आज्ञा लेने को आता, तो राजा उसे घण्टों द्वारा पर विटाय रखता, पर अन्दर न बुलाता ;

( ३२० )

इससे मन्त्रीको घृणा हो गई ; उसने घर आकर पुत्रोंसे कहा कि, चार घण्टोंमें जितना धन और सामान ले जा सकते हो, दूसरे राजाके राज्यमें ले जाओ। मैं अब इस संसार को त्याग कर परमात्मासे लौ लगाऊँगा। लड़के जितना धन ले जा सके लेगये। शेष धन वज्रोंरने गुरीबोंको लुटा दिया और आप किसी और राजाके राजमें कोंपड़ी बनाकर तप करने लगा।

दो तीन दिन बाद जब उस विषयी राजाके राज्यमें गड़बड़ फैली, उसे अपने प्रधान मन्त्रीकी याद आई। बुलानेको आदमी भेजे, तो मालूम हुआ, कि वह तो सन्यासी हो गया है। राजा स्वयं उसके पास गया और बोला—“हे मन्त्रिवर ! तुम इतने बड़े राज्यके प्रधान मन्त्री और कर्त्ता-धर्त्ता थे, तुमने वह सब सुबेश्वर्य छोड़ क्यों बनमें डेरा लगाया है ? तुम्हें इसमें क्या मिला ?” मन्त्रीने कहा—“महाराज ! ईश्वरकी शरण में आनेसे इतना तो दो-चार दिनोंमें ही मिल गया कि, घण्टों आपके द्वारपर आपकी प्रतीक्षामें पाँच पीटा करता था ; पर आप दर्शन तक न देते थे ; पर आज श्रीमान्, सपरिवार, मेरे स्थानपर, मुझे आदरणीय समझकर, इस सघन बनमें पधारें हैं। यह तो दो-तीन दिनोंकी कमाई है। आगेकी बात फिर पूछ सकते हैं।” इसमें शक नहीं, जो सबकी आशा तजकर एक परमात्माकी शरणमें जाता है, उसे कोई अभाव नहीं रहता ; पर . पक्के और दृढ़ विश्वासकी ज़रूरत है।

( ३२१ )

ईश्वरको जो जिसी कामनासे भजता है, उसकी वह कामना अवश्य पूरी होती है। पर जो कोई उसे निष्काम भक्तिसे भजता है, उसे स्वयं ईश्वर मिलता है, और जब वह मिल जाता है, तब कुछ भी घाटा नहीं रहता; त्रिलोकी की सम्पदा उसके चरणोंमें ज्वलंतो आना चाहती है। अतः बुद्धिमानोंको परमात्माको छोड़ और किसीके आगे दीनता न करनी चाहिये। मनुष्यके पास है ही क्या? कोई छोटा मिबारी है और कोई बड़ा। जिसे किसी भी चीज़की चाह नहीं, वही सच्चा धनी है। ऐसा धनी करोड़ोंमें एक भी नहीं; तब मँगतेको मँगतेसे माँगना क्या उचित है?

ईश्वर ही कामना पूरी कर सकता है।

एक राजाने किसी राजाका राज्य छीन लिया। वह राजा तप करने लगा। कुछ दिन बाद उसकी प्रशंसा सुन कर राजा उस तपस्वी-राजाके पास गया और बोला—“आप अपना राज्य वापस लीजिये; इसके सिवा आप जो और माँगें सो दूँ।” तपस्वी राजाने कहा—“राजन्! आपको धन्यवाद है; पर यदि आप मृत्युरहित जीवन, नित्यधन, वृद्धावस्था-रहित जवानी, बिना दुःखका सुख और बिना रंजकी खुशी दे सकें तो दीजिये।” राजाने कहा—“इन्हें तो मैं नहीं दे सकता। ये सब तो ईश्वर

२१

( ३२२ )

से ही मिल सकते हैं।” यह जवाब सुन तपस्वी-राजाने कहा—“इसीसे मैं अब सबको छोड़ ईश्वरकी शरणमें आया हूँ कि, मेरी इच्छा पूरी हो; क्योंकि मनुष्योंसे यह काम हो न सकेगा।”

अनेक अज्ञानी जिन्हें ईश्वर पर विश्वास नहीं, मनमें समझते हैं कि, ईश्वर हमें खाने को देने थोड़े ही आवेगा। यह उनकी गलती है। ईश्वर उनको भी खाना पहुँचाता है, जो उसे कभी याद भी नहीं करते। फिर, जो उसे याद करते हैं, उन्हें वह क्यों न खाना पहुँचावेगा? अवश्य पहुँचावेगा, वशतः कि उसमें दृढ़ विश्वास हो। अपने भक्तोंके लिये ईश्वर हरदम तैयार रहता है।

नापित-भक्तके लिये ईश्वर नापति बना।

एक नाई दुर्घोषनके पैर चापा करता था। एक दिन उसके चलनेके समय दो महात्मा उसे उसके द्वारपर मिल गये। वह उन्हें ईश्वरभक्त समझ, उनकी सेवामें लग गया और राजा के यहाँ जानेकी बात भूल गया। समय पर राजाने नाईकी याद की। भगवान् नाईका रूप धरकर दुर्घोषनके पास पहुँचे और उसके पैर दाबने लगे। अन्तमें अपने भक्तकी नौकरी पूरी करके, वह वहाँसे चले गये। इतनेमें नाई डरता काँपता हुआ

( ३२३ )

पहुँचा और राजासे क्षमा-प्रार्थना करने लगा। दुर्घोषनने कहा—“अरे पागल हो गया है क्या ! अभी-अभी तो तू मेरे पैर दाबही रहा था।” इस बातको सुनकर नाई समझ गया कि, भगवान् ने स्वयं मेरे लिये नाईका काम किया। इतनीसी भक्ति-उपासनाका यह फल ! अब मैं उनको छोड़ दूसरेकी खुशामद और सेवा क्यों करूँ ? ऐसा विचारकर वह घर छोड़ बनमें चला गया।

भगवान्का दूसरा नाम विश्वम्भर है। जो विश्व—संसार का पालन करता है, उसेही विश्वम्भर कहते हैं। भगवान् त्रिलोकी के जीवमात्रको उनका आहार पहुँचाते हैं, इसमें शक् नहीं। एक सच्ची घटना है, पाठक सुनें :—

ईश्वर ही सब की पालना करता है।

एक बार महाराज शिवाजी एक बहुत बड़ा महल बनवा रहे थे। उसमें हज़ारों मज़दूर और कारीगर लग रहे थे। उन्हें देखकर शिवाजीके मनमें अहंकार हुआ कि, मैं ऐसा हूँ, जो इतने मनुष्योंको रोज रोटा देता हूँ। इतनेमें समर्थ स्वामी रामदास आ गये। वे महाराजके मनको ताड़ गये। बोले—“राजन ! सामने जो पत्थर पड़ा है उसके दो टुकड़े कराइये।” राजाके हुकमसे पत्थरके दो टुकड़े किये गये। उस शिलाके भीतर

( ३२४ )

एक मोटा-ताज़ा मैडक निकला। उसे देखते ही शिवाजी विस्मयमें डूब गये। स्वामीजीने कहा—“राजन् ! इस पत्थरके भीतर इस मैडकको खाना कौन पहुँचाता था ? मनुष्य कोई चीज़ नहीं, उसे स्वयं तृष्णा है, अतः वह दरिद्री है। सबकी पालना करने वाले और प्रेमके साथ पालना करने वाले वही भगवान् हैं !

नरसी मेहताकी हुण्डीका भुगतान साहूकारका रूप धरकर स्वयं भगवान्ने किया। द्रौपदी और दुर्वासाके मामलेमें भगवान् वनमें दौड़े आये और द्रौपदीकी लाज रक्खी तथा राजा अम्बरीषकी—दुर्वासासे रक्षा की। ऐसे बहुतसे दृष्टान्त हैं। मनुष्यको सदा परमात्मासे माँगना चाहिये। उसका भण्डार अक्षय है और वह परम दयालु है।

पिता पुत्र की इच्छा अवरय पूरी करता है।

✠ ✠ ✠

एक वैश्य निर्धनतासे तंग आकर काशी चला गया और वहाँ रोज़गार करने लगा। कुछ समय बाद उसके पास लाखों-करोड़ों का धन हो गया। वह एक मन्दिर बनवाने लगा। घरसे चलते समय वह एक छोटासा लड़का छोड़ गया था। लड़का जब १६१७ वर्षका हो गया, उसने माँसे पिताका पता पूछा। माँने कहा—“मुझे तो पता नहीं।” यह सुनते ही पुत्र अपने पिताकी

( ३२५ )

तलाशमें चल निकला। माँको भी उसने अपने साथ ले लिया। कुछ दिनों बाद, बड़ी-बड़ी तकलीफें उठाकर, वह काशी पहुँचा और पेट पालनेके लिये उसी मन्दिरमें मजदूरी करने लगा। सेठने उसे नया मजदूर समझ, उससे उसका निवास स्थान और पिताका नाम पूछा। उसने सब बता दिया और कहा कि माँ भी आई है। सेठने अपनी खीको पहचान, पुत्रको छाती से लगा लिया और उसे सारा धन दे दिया। इस दृष्टान्तसे यह समझना चाहिये कि, इसी तरह जो पुरुष तकलीफें उठाकर परमेश्वरकी खोज करता है, परमेश्वर उसे अवश्य मिल जाता है और अपने पुत्रकी इच्छा पूरी करता है।

अहंकारको त्यागकर, विशुद्ध मनसे, परमात्माकी खोज करो। वह दूर नहीं, तुम्हारे भीतर ही मौजूद है। खोज करनेसे तुम्हें अवश्य मिल जायगा। किसीने बिल्कुल ठीक कहा है:—

है तजस्सुस शर्त्त यों, मिलनेको क्या मिलता नहीं।

है खुदी जब तक इन्हींमें, खुदा मिलता नहीं ॥

तलाश शर्त्त है; तलाश करनेवालोंको क्या नहीं मिलता? जब तक मनुष्यमें खुदी या अहंकार है, तबतक उसे ईश्वर नहीं मिलता। अहंकार से हृदय शुद्ध हुआ और ईश्वर-दर्शन हुए। यदि ईश्वर मिल गया, तो जगत्का राज्य मिल गया। अतः मनुष्यो! मनुष्योंकी खुशामद छोड़, केवल दयासिन्धु जगदीश

इती (२)

एक

ता, के रन्तु मत, रन्तु रना

कि के