वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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ईश्वरको जो जिसी कामनासे भजता है, उसकी वह कामना अवश्य पूरी होती है। पर जो कोई उसे निष्काम भक्तिसे भजता है, उसे स्वयं ईश्वर मिलता है, और जब वह मिल जाता है, तब कुछ भी घाटा नहीं रहता; त्रिलोकी की सम्पदा उसके चरणोंमें ज्वलंतो आना चाहती है। अतः बुद्धिमानोंको परमात्माको छोड़ और किसीके आगे दीनता न करनी चाहिये। मनुष्यके पास है ही क्या? कोई छोटा मिबारी है और कोई बड़ा। जिसे किसी भी चीज़की चाह नहीं, वही सच्चा धनी है। ऐसा धनी करोड़ोंमें एक भी नहीं; तब मँगतेको मँगतेसे माँगना क्या उचित है?
ईश्वर ही कामना पूरी कर सकता है।
एक राजाने किसी राजाका राज्य छीन लिया। वह राजा तप करने लगा। कुछ दिन बाद उसकी प्रशंसा सुन कर राजा उस तपस्वी-राजाके पास गया और बोला—“आप अपना राज्य वापस लीजिये; इसके सिवा आप जो और माँगें सो दूँ।” तपस्वी राजाने कहा—“राजन्! आपको धन्यवाद है; पर यदि आप मृत्युरहित जीवन, नित्यधन, वृद्धावस्था-रहित जवानी, बिना दुःखका सुख और बिना रंजकी खुशी दे सकें तो दीजिये।” राजाने कहा—“इन्हें तो मैं नहीं दे सकता। ये सब तो ईश्वर
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