वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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इससे मन्त्रीको घृणा हो गई ; उसने घर आकर पुत्रोंसे कहा कि, चार घण्टोंमें जितना धन और सामान ले जा सकते हो, दूसरे राजाके राज्यमें ले जाओ। मैं अब इस संसार को त्याग कर परमात्मासे लौ लगाऊँगा। लड़के जितना धन ले जा सके लेगये। शेष धन वज्रोंरने गुरीबोंको लुटा दिया और आप किसी और राजाके राजमें कोंपड़ी बनाकर तप करने लगा।
दो तीन दिन बाद जब उस विषयी राजाके राज्यमें गड़बड़ फैली, उसे अपने प्रधान मन्त्रीकी याद आई। बुलानेको आदमी भेजे, तो मालूम हुआ, कि वह तो सन्यासी हो गया है। राजा स्वयं उसके पास गया और बोला—“हे मन्त्रिवर ! तुम इतने बड़े राज्यके प्रधान मन्त्री और कर्त्ता-धर्त्ता थे, तुमने वह सब सुबेश्वर्य छोड़ क्यों बनमें डेरा लगाया है ? तुम्हें इसमें क्या मिला ?” मन्त्रीने कहा—“महाराज ! ईश्वरकी शरण में आनेसे इतना तो दो-चार दिनोंमें ही मिल गया कि, घण्टों आपके द्वारपर आपकी प्रतीक्षामें पाँच पीटा करता था ; पर आप दर्शन तक न देते थे ; पर आज श्रीमान्, सपरिवार, मेरे स्थानपर, मुझे आदरणीय समझकर, इस सघन बनमें पधारें हैं। यह तो दो-तीन दिनोंकी कमाई है। आगेकी बात फिर पूछ सकते हैं।” इसमें शक नहीं, जो सबकी आशा तजकर एक परमात्माकी शरणमें जाता है, उसे कोई अभाव नहीं रहता ; पर . पक्के और दृढ़ विश्वासकी ज़रूरत है।