वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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( ३१६ )
दौरत धावत पेट दिखावत ।
तू शठ कीट सदा अनही को ॥
सुन्दर क्यूँ विश्वास न राखत ? ।
सो प्रभु विश्व भरे सब ही को ॥
( २ )
सेवर भूचर जे जलके चर ।
देत आहार चराचर पोवे ।
वे हरि जो सब कूँ प्रतिपालत ।
ज्यूँ जिहि भौति तिसी विधि तोषै ॥
तू अब क्यूँ विश्वास न राखत ? ।
भूलत है कित धोखहि धोखै ॥
तोहि तहाँ पहुँचाय रहे प्रभु ।
सुन्दर बैठि रहै कित खोखै ॥
ईश्वरकी शरणमें जानेसे अभाव नहीं रहता ।
—*—
एक राजा बड़ा आलसो और विषयी था । वह राज-काज को अरा भी न देखता था । सारा भार वज्रौर के लिए पर था । वज्रौर यदि किसी ज़रूरी कामकी आज्ञा लेने को आता, तो राजा उसे घण्टों द्वारा पर विटाय रखता, पर अन्दर न बुलाता ;