भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जाता है उनसे मिलने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करता है, दरबानोंको तरह-तरहको बेदङ्गों बातें सुनता है । अगर वह कुछ भी अङ्कसे काम ले, तो उसे उसके द्वार पर जाना चाहिये, जहाँ कोई रोकने वाला नहीं, जहाँ दिल दुखानेवाली बातोंका नाम भी नहीं, जो खारे संसारका स्वामी और नित्य सुख के देने वाला है । वह क्या उसकी इच्छा पूरी न करेगा ? अवश्य पूरी करेगा । जो बिना जड़ की अमरबेलको पोषता है, उसे छोड़कर और को खोजना भूलकी बात है । रहीम कवि कहते हैं :—

अमरबेलि बिन मूलकी, प्रतिपालत है ताहि । “रहिमन” ऐसे प्रभुहि तजि, खोजत फिरिये काहि ॥

रहीम कवि कहते हैं, जो प्रभु बिना मूल की अमरबेल की प्रतिपालना करता है, ऐसे प्रभु को छोड़कर किसे खोजते फिरें ?

और भी—

( ? )

जा दिनतें गर्भवास तज्यो नर ।

आइ आहार लियो तवही को ॥

खाताहि खात भये इतने दिन ।

जानत नाहि न भूल कहीं को ॥