वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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96 It is a wonder why wise men like to take up their abode in any other place than Kashi ; where partaking of different kinds of eatables in gardens is the most austere penance, where the wearing of a narrow strip of loin-cloth is considered as respectable dress, where unrestricted wandering beggary is thought to be honourable and where the near approach of death is looked upon as bringing everlasting bliss !
नायते सम्यो रहस्यमधुना निद्राति नाथो यदि
स्थित्वा ऋच्यति कुप्यति प्रसुरिति द्वारेषु येषां वचः
चेतस्तानपहाय याहि भवनं देवस्य विश्वेश्वरिभु-
निर्दौवारिकनिर्दयोक्त्यपरुषं निःसीमशर्मप्रदम् ॥६७॥
हे मन ! जिनके द्वार पर,—“मालिक मकानसे मिलनेका समय नहीं है, वे इस समय एकान्तमें बैठे हैं, वे इस वक्त सो रहे हैं, अगर तुम्हें यहाँ खड़ा देखेंगे तो नाराज़ होंगे”—ऐसी बातें सुनाई देती हैं, उनको त्याग कर विश्वेश्वर की शरण में जा, जिनके द्वार पर रोकनेवाला दरवान नहीं, जहाँ निर्दय और कठोर बचन कभी सुननेमें नहीं आते, जो अनन्त और नित्य सुखके देनेवाले हैं ॥६७॥
मूर्ख मनुष्य, ना-सप्रभोके कारण, वृथा अमीरों के दरवाजे पर जाता है और अपमानसूचक बाते सुनता है ; जिनके यह
परमात्मा उनके हृदय-कमल में मौजूद है। हाँ, जो अज्ञानी हैं, वे ही तीथवास करते और तीर्थमें शरीर त्यागना चाहते हैं।