वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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से ही मिल सकते हैं।” यह जवाब सुन तपस्वी-राजाने कहा—“इसीसे मैं अब सबको छोड़ ईश्वरकी शरणमें आया हूँ कि, मेरी इच्छा पूरी हो; क्योंकि मनुष्योंसे यह काम हो न सकेगा।”
अनेक अज्ञानी जिन्हें ईश्वर पर विश्वास नहीं, मनमें समझते हैं कि, ईश्वर हमें खाने को देने थोड़े ही आवेगा। यह उनकी गलती है। ईश्वर उनको भी खाना पहुँचाता है, जो उसे कभी याद भी नहीं करते। फिर, जो उसे याद करते हैं, उन्हें वह क्यों न खाना पहुँचावेगा? अवश्य पहुँचावेगा, वशतः कि उसमें दृढ़ विश्वास हो। अपने भक्तोंके लिये ईश्वर हरदम तैयार रहता है।
नापित-भक्तके लिये ईश्वर नापति बना।
एक नाई दुर्घोषनके पैर चापा करता था। एक दिन उसके चलनेके समय दो महात्मा उसे उसके द्वारपर मिल गये। वह उन्हें ईश्वरभक्त समझ, उनकी सेवामें लग गया और राजा के यहाँ जानेकी बात भूल गया। समय पर राजाने नाईकी याद की। भगवान् नाईका रूप धरकर दुर्घोषनके पास पहुँचे और उसके पैर दाबने लगे। अन्तमें अपने भक्तकी नौकरी पूरी करके, वह वहाँसे चले गये। इतनेमें नाई डरता काँपता हुआ