भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पहुँचा और राजासे क्षमा-प्रार्थना करने लगा। दुर्घोषनने कहा—“अरे पागल हो गया है क्या ! अभी-अभी तो तू मेरे पैर दाबही रहा था।” इस बातको सुनकर नाई समझ गया कि, भगवान् ने स्वयं मेरे लिये नाईका काम किया। इतनीसी भक्ति-उपासनाका यह फल ! अब मैं उनको छोड़ दूसरेकी खुशामद और सेवा क्यों करूँ ? ऐसा विचारकर वह घर छोड़ बनमें चला गया।

भगवान्का दूसरा नाम विश्वम्भर है। जो विश्व—संसार का पालन करता है, उसेही विश्वम्भर कहते हैं। भगवान् त्रिलोकी के जीवमात्रको उनका आहार पहुँचाते हैं, इसमें शक् नहीं। एक सच्ची घटना है, पाठक सुनें :—

ईश्वर ही सब की पालना करता है।

एक बार महाराज शिवाजी एक बहुत बड़ा महल बनवा रहे थे। उसमें हज़ारों मज़दूर और कारीगर लग रहे थे। उन्हें देखकर शिवाजीके मनमें अहंकार हुआ कि, मैं ऐसा हूँ, जो इतने मनुष्योंको रोज रोटा देता हूँ। इतनेमें समर्थ स्वामी रामदास आ गये। वे महाराजके मनको ताड़ गये। बोले—“राजन ! सामने जो पत्थर पड़ा है उसके दो टुकड़े कराइये।” राजाके हुकमसे पत्थरके दो टुकड़े किये गये। उस शिलाके भीतर

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