भारतकोश
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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ३२३ )

पहुँचा और राजासे क्षमा-प्रार्थना करने लगा। दुर्घोषनने कहा—“अरे पागल हो गया है क्या ! अभी-अभी तो तू मेरे पैर दाबही रहा था।” इस बातको सुनकर नाई समझ गया कि, भगवान् ने स्वयं मेरे लिये नाईका काम किया। इतनीसी भक्ति-उपासनाका यह फल ! अब मैं उनको छोड़ दूसरेकी खुशामद और सेवा क्यों करूँ ? ऐसा विचारकर वह घर छोड़ बनमें चला गया।

भगवान्का दूसरा नाम विश्वम्भर है। जो विश्व—संसार का पालन करता है, उसेही विश्वम्भर कहते हैं। भगवान् त्रिलोकी के जीवमात्रको उनका आहार पहुँचाते हैं, इसमें शक् नहीं। एक सच्ची घटना है, पाठक सुनें :—

ईश्वर ही सब की पालना करता है।

एक बार महाराज शिवाजी एक बहुत बड़ा महल बनवा रहे थे। उसमें हज़ारों मज़दूर और कारीगर लग रहे थे। उन्हें देखकर शिवाजीके मनमें अहंकार हुआ कि, मैं ऐसा हूँ, जो इतने मनुष्योंको रोज रोटा देता हूँ। इतनेमें समर्थ स्वामी रामदास आ गये। वे महाराजके मनको ताड़ गये। बोले—“राजन ! सामने जो पत्थर पड़ा है उसके दो टुकड़े कराइये।” राजाके हुकमसे पत्थरके दो टुकड़े किये गये। उस शिलाके भीतर

( ३२४ )

एक मोटा-ताज़ा मैडक निकला। उसे देखते ही शिवाजी विस्मयमें डूब गये। स्वामीजीने कहा—“राजन् ! इस पत्थरके भीतर इस मैडकको खाना कौन पहुँचाता था ? मनुष्य कोई चीज़ नहीं, उसे स्वयं तृष्णा है, अतः वह दरिद्री है। सबकी पालना करने वाले और प्रेमके साथ पालना करने वाले वही भगवान् हैं !

नरसी मेहताकी हुण्डीका भुगतान साहूकारका रूप धरकर स्वयं भगवान्ने किया। द्रौपदी और दुर्वासाके मामलेमें भगवान् वनमें दौड़े आये और द्रौपदीकी लाज रक्खी तथा राजा अम्बरीषकी—दुर्वासासे रक्षा की। ऐसे बहुतसे दृष्टान्त हैं। मनुष्यको सदा परमात्मासे माँगना चाहिये। उसका भण्डार अक्षय है और वह परम दयालु है।

पिता पुत्र की इच्छा अवरय पूरी करता है।

✠ ✠ ✠

एक वैश्य निर्धनतासे तंग आकर काशी चला गया और वहाँ रोज़गार करने लगा। कुछ समय बाद उसके पास लाखों-करोड़ों का धन हो गया। वह एक मन्दिर बनवाने लगा। घरसे चलते समय वह एक छोटासा लड़का छोड़ गया था। लड़का जब १६१७ वर्षका हो गया, उसने माँसे पिताका पता पूछा। माँने कहा—“मुझे तो पता नहीं।” यह सुनते ही पुत्र अपने पिताकी

( ३२५ )

तलाशमें चल निकला। माँको भी उसने अपने साथ ले लिया। कुछ दिनों बाद, बड़ी-बड़ी तकलीफें उठाकर, वह काशी पहुँचा और पेट पालनेके लिये उसी मन्दिरमें मजदूरी करने लगा। सेठने उसे नया मजदूर समझ, उससे उसका निवास स्थान और पिताका नाम पूछा। उसने सब बता दिया और कहा कि माँ भी आई है। सेठने अपनी खीको पहचान, पुत्रको छाती से लगा लिया और उसे सारा धन दे दिया। इस दृष्टान्तसे यह समझना चाहिये कि, इसी तरह जो पुरुष तकलीफें उठाकर परमेश्वरकी खोज करता है, परमेश्वर उसे अवश्य मिल जाता है और अपने पुत्रकी इच्छा पूरी करता है।

अहंकारको त्यागकर, विशुद्ध मनसे, परमात्माकी खोज करो। वह दूर नहीं, तुम्हारे भीतर ही मौजूद है। खोज करनेसे तुम्हें अवश्य मिल जायगा। किसीने बिल्कुल ठीक कहा है:—

है तजस्सुस शर्त्त यों, मिलनेको क्या मिलता नहीं।

है खुदी जब तक इन्हींमें, खुदा मिलता नहीं ॥

तलाश शर्त्त है; तलाश करनेवालोंको क्या नहीं मिलता? जब तक मनुष्यमें खुदी या अहंकार है, तबतक उसे ईश्वर नहीं मिलता। अहंकार से हृदय शुद्ध हुआ और ईश्वर-दर्शन हुए। यदि ईश्वर मिल गया, तो जगत्का राज्य मिल गया। अतः मनुष्यो! मनुष्योंकी खुशामद छोड़, केवल दयासिन्धु जगदीश

इती (२)

एक

ता, के रन्तु मत, रन्तु रना

कि के

( ३२६ )

की शरणमें जाओ ! वह बिना अपमान किये, प्रेम के साथ आपके अभावोंको सुने और दूर करेगा तथा आपको नित्य- शायी सुख-शान्ति बख्शेगा ।

व्यप्यय ।

बैठ पौरिया द्वार, छड़ी कर पहरी राखत । सोचत स्वामि हमार, जाहु तुम ऐसे भाषत । करि हैं क्रोध अपार, लखैं जो तुमको द्वारे । जाहु विश्वपति द्वार, तहाँ नहि रोकनहारे । जहाँ निर्दय कटुवादी नहीं, अवशि तहाँ चलिजाइये । वहैं निर्भय ब्रह्मचंद सुख, ब्रह्मचंद तहाँ पाइये ॥६७॥

97. O mind, leaving dependence on those at whose doors such answers are heard, as, "It is not the proper time for you to see the master of the house, as he likes to be alone now, or is asleep, and if he happens to find you standing here, he will be offended," etc, do thou take thy shelter in the mansion of the Lord of the universe at Whose doors there is no sentinel, where no unsympathetic and harsh words are heard and who is the Giver of eternal happiness.

पिय सखि विपदगड्वातप्रताप परम्परा- तिपरिचले चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः ॥ मुदमिव वलात्पिणडीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्- अमयति मनो नो जानीमः किमत्र विधास्यति ॥६८॥

( ३२७ )

हे प्यारी सखी बुद्धि ! कुम्हार जिस तरह गीली मिट्टीके लौदों को चाकपर चढ़ाकर डंडेसे चाकको बारम्बार घुमाता है और उससे इच्छानुसार वर्तन तैयार करता है ; उसी तरह संसारको गढ़नेवाला ब्रह्मा हमारे चित्तको चिन्ताके चाकपर चढ़ाकर, विपत्तियोंके डगडेसे चाकको लगातार घुमाता हुआ, हमारा क्या करना चाहता है, यह हमारी समझमें नहीं आता ! ॥६८॥

मनुष्य के पीछे भगवान् ने चिन्ता बुरी लगा दी है। बात यह है, कि मनुष्यके पूर्व जन्मके कर्मोंके कारण या इस जन्म की भूलोंके कारण, उसे विपत्तियाँ भोगनी ही पड़ती हैं। विपत्तियोंसे पार होनेके लिये, मनुष्य रात-दिन चिन्तित रहता है। चिन्ता या फिकसे मनुष्यका रूप-रङ्ग आदि सब नष्ट होकर शीघ्र ही बुढ़ापा आ जाता है। आज-कल ४० बरसकी उम्र में हो लोग बूढ़े हो जाते हैं, इसका कारण चिन्ता ही है। अगर चिन्ता न होती, तो मनुष्यको कुछ दुःख न होता। जहाँतक हो, मनुष्यको चिन्ताको पास न आने देना चाहिये ; क्योंकि चिन्ता चितासे भी डुरी है। चिता मरे हुए को भस्म करती है, पर चिन्ता जीते हुए को ही जलाकर खाक कर देती है ; अतः चिन्तासे दूर रहो। खी पुत्र और धन की चिन्ता में अपनी अमूल्य दुर्लभ कायाको नाश न करो ; क्योंकि ये खी पुत्र प्रभुति तुम्हारे कोई नहीं। अगर चिन्ता और विचार ही करना है, तो इस बातका करो कि, तुम कौन हो और

( ३२८ )

कहाँसे आये हो? स्वामी शङ्कराचार्यने “मोहमुद्गर” में कहा है:—

का तव कान्ता: ? कस्ते पुत्र: ?

संसारोऽयमतीव विचित्र: ।

कस्य त्वं वा ? कुत आयात:

तत्त्वं चिन्तय तदिदं भ्रात: ॥

कौन तेरी स्त्री है? कौन तेरा पुत्र है! यह संसार अतीव विचित्र है। तु कौन है? कहाँ से आया है? हे भाई! इस तत्त्व की चिन्ता कर; अर्थात् न कोई तेरी स्त्री है और न कोई तेरा पुत्र है, तथा चिन्ता क्यों करता है?

तु कौन है? कहाँ से आया है? क्यों आया है? तूने अपना कर्त्तव्य पालन किया है या नहीं? तेरा अन्तिम परिणाम क्या है? इत्यादि विचारों द्वारा अपने स्वरूपको पहचान जाने अथवा ईश्वरकी शरण में चले जानेसे ही चिन्ता से पीड़ा छूटेगा और शान्ति मिलेगी। निश्चय ही, चिन्ता और विपत्तियोंसे बचने के लिये, भगवान्का आश्रय लेना सर्वोपरि उपाय है। विपत्ति रूपी समुद्रमें डूबते हुए के लिए भगवान्का नाम ही सच्चा सहारा है। गोस्वामि तुलसीदासजीने कहा है:—

तुलसी साथी विपत्तिके, विद्या विनय विवेक ।

साहस सुकुल सत्यव्रत, राम भरोसो एक ॥

( ३२६ )

तुलसी असमयके तखा, साहस धर्म विचार । सुकृत शील स्वभाव श्रुतु, रामशरण आधार ॥ खेलेत बालक व्याल संग, पावक मेलत हाथ । तुलसी शिशु पितु मातु इव, राखत सिय रघुनाथ ॥ तुलसी केवल राम पद, लागे सरल सनेह । तौ घर घट बन वाट महँ, कताहूँ रहै किन देह ॥

सारांश यह, कि जो हमारे चित्तको चिन्ताके चाक पर चढ़ाकर विपत्तियोंके डण्डे से घुमाता है, यदि हम उसको ही शरणमें चले जायँ, उसीसे प्रेम करें, तो वह हमारे चित्तको चिन्ताके चाक पर न रखे ; अर्थात् हमें चिन्ताश्रियें न जलना पड़े ; सुख-शान्ति सदा हमारे सामने हाथ बाँधे रखें। यह बला उन्हींको खाती है, जो भगवान्से विमुख रहते हैं। इसलिये यदि इस चिन्ता-डायनसे बचना चाहो, तो परमात्माको भजो।

दोहा।

मनको चिन्ताचक धर, खल विधि रहौं सुभाय । रवि है कहा कुलालसम, जान्यौ कङ्क न जाय ? ॥६८॥

98. O friend, we do not know what the unfriendly Brahma, the creator of the world, will do to us, bent as he is on revolving our minds mercilessly fixing them on the wheel of cares, made unceasingly to turn round and round by the application of the stick of vicissitudes like a clever potter who puts a lump of wet clay on his wheel and by turning it round with a stick shapes it into any desired vessel.

( ३३० )

महेश्वरे वा जगतायधीश्वरे जनार्दने वा जगदन्तरात्मनि ।

तयोर्न भेदयतिपरितिरस्ति ये तथापि शक्तिस्तत्त्वोन्दुशेखरे ॥६६॥

यद्यपि मुक्ते विश्वेश्वर शिव और सर्वात्मन विष्णुमें कोई भेद नहीं दीखता ; तथापि मेरा मन उन्होंनेकी और सुकता है, जिनके मस्तकमें तरुण चन्द्रमा विराजमान है ; अर्थात् मैं शिवको ही चाहता हूँ ॥६६॥

विष्णु और शिवमें कोई भेद नहीं, एक ही परमात्माके अलग-अलग नाम हैं, वही कृष्ण हैं, वही रघुनाथ हैं, वही राम हैं और वही शिव हैं। पर फिर भी ; जिस नाम का आश्रय ले लिया उसीका भरोसा करना ठीक है। मन भटकाना अच्छा नहीं।

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी ब्रह्मावन गये। वहाँ उन्हें भगवान् कृष्णके दर्शन हुए। भगवान्की बाँको भाँकी देखकर गोस्वामी जी मुग्ध हो गये, पर उन्होंने उनको खिर न नवाया ; क्योंकि उनके इष्टदेव रामचन्द्र जी थे। उन्होंने उस समय कहा :—

“कहा कहूँ छवि आजकी, भले बने हो नाथ ।

तुलसी मस्तक जब नवै, धनुषवाण लेब्रो हाथ ॥”

आपकी छवि आज बहुत ही मनोमुग्धकर है, पर मैं तो आप को तभी प्रणाम करूँगा, जब आप धनुषवाण हाथ में

( ३३१ )

लेकर रामचन्द्र बनोगे। भगवान् को तत्काल रामरूप धर, धनुषवाण हाथमें लेना पड़ा। यह काम भगवान् को भक्तकी दृढ़ता देख कर करना पड़ा।

प्रीति पथेहियेकी सच्ची और आदर्श है। वह चाहे प्यासा मर जाय, पर मेवके सिवा किसी भी जलाशयका जल नहीं पीता। "उत्तर वातकाष्टक" में लिखा है :—

पयोद हे ! वारि ददासि वा न वा ।

त्वदेकचित्तः पुनरेष चातकः ॥

वरं महत्या श्रियते पिपासया

तथापि नान्यस्य कोरात्युपासनाम् ॥

हे मेघ ! तू जल दे चाहे न दे, चातक तो तेरा ही आश्रय रखता है। वोर प्याससे मर भले ही जाय, पर वह दूसरेको उपासना नहीं करता। गोस्वामि तुलसीदासजीने भी कहा है :—

चातक धन तजि दूसरे, जियत न नाई नारि ।

मरत न मैंगे अर्धजल, सुरसरिहु को वारि ॥

व्याधा वधो पपीहरा, पुरो गंगजल जाय ।

चौंच गूँदि पीवे नहीं, धिक पीवन प्रण जाय ॥

चातकने मेघको छोड़ और किसीको अपनी जिन्दगी में स्त्रि न नवाया। मरते समय गंगाका जल भी ग्रहण न किया। किसी शिकारी ने किसी चातकको मारा। वह गंगाजी में गिर

( ३३२ )

पड़ा, प्यास के मारे धबरा रहा था, पर गंगा जल नहीं पोता था। उसने उठती बाँच बन्द कर ली ; कि कहीं जल मुखमें न चला जाय और मेरा प्रण दूद जाय। वाह वाह ! प्रीति और भक्ति हो तो ऐसी ही हो।

सारंगश यह है, कि भगवान् के भी जिस नामसे प्रेम हो, उसे छोड़ कर दूसरेसे प्रेम न करना चाहिये। एक ही पतिकी खी होने में भलाई है। जिसके अनेक पति होते हैं, उसका भला नहीं होता। अनेक देवी देवताओं के उपासक वातक से शिक्षा ग्रहण करें। कहा है :—

पतिव्रताको सुख धना, जाके पति है एक।

मन मैली व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥

पतिव्रता पतिकों भजे, और न अन्यसुहाय।

सिंह-बचा जो लंघना, तोभी धास न खाय ॥

“कबिरा” सीप समुद्र की, रटे पियास पियास।

सकल बूँदको ना भिने, स्वाति बूँदकी धास ॥

प्रीति रीति तुम्ह सो मेरे, बहु गुनियाला कन्त।

जा हंसि बैलूँ और सँ, तो नील रंगाऊँ दन्त ॥

पतिव्रता, जिसके एक पति होता है, सदा सुखी रहती है ; किन्तु अनेक खसमवाली व्यभिचारिणी सदा दुखी रहती है। पतिव्रता सदा अपने पतिको ही चाहती है ; उसे दूसरा अच्छा नहीं लगता। सिंहका बच्चा, लंघन पर लङ्घन करने पर भी,

इती (२)

एक

गा, के लु त, लु ना

के के

( ३३३ )

घास नहीं खाता । कबीरदास कहते हैं, समुद्रकी सीप प्यास- ही-प्यास रटा करती है ; कितनी ही बूँदें क्यों न गिरे, उसे तो स्वातिकी बूँद ही प्यारी लगती है । मेरे गुणनिधान कन्त ! मेरी प्रीति तुझसे है । जो मैं दूसरेसे हँसकर बोल्छूँ तो मेरा काला सुँद हो ।

दोहा ।

नाहिं शिव अरु विष्णुमें, सूर्य अन्तर मोग । तदिप चन्द्रशेखर लखत, प्रीति अधिक कछु होय ॥६६॥

99. Although I see no difference between Shiva, 'the Lord of the universe, and Vishnu the Omnipresent, but my love flows towards the One who bears the new moon on his forehead, i. e., Shiva.

रे कंदर्प करं कर्दर्थयसि किं कोदण्डकारितैः

रेरे कोकिल कोमलैः कलरवैः किं त्वं वृथाजल्पसि ॥

मुग्धे क्षिप्रविदग्धमुग्धमधुरैलोलेः कटाचैरलं

चेतरनुम्बितचन्द्रचूडचरणभ्यानामृतं वर्त्तते ॥१००॥

हे कामदेव ! तू धनुष्यकार सुतानेके लिये क्यों बारबार हाथ उठाता है ? हे कोकिला ! तू मीठी-मीठी सुहावनी आवाज़में क्यों कुड-कुड करती है ? ऐ मूर्खा स्त्री ! तू अपने मनोमोहक मधुर कटाक्ष मुझपर क्यों चलाती है ? अब तुम मेरा कुछ नहीं कर

( ३२४ )

सकते ; क्योंकि अब मेरे चित्तने शिवके चरण चूमकर अमृत पी लिया है ॥१००॥

जब तब मनुष्यका मन ब्रह्मानन्दका भङ्गा नहीं जानता, जब तक वह परमात्माके चरणोंमें ध्यान लगा कर अमृत नहीं पीता, तभी तक कामदेवका ज़ोर चलता है, तभीतक कोकिला का पञ्चम स्वर उसके दिलमें खलबली पैदा करता है, तभी तक स्त्री के कटाक्ष-वाण उस पर असर करते हैं ; कामारि शिव से प्रीति होने पर ये सब कुछ नहीं कर सकते । भगवान् शिव और कामदेवमें वैर है ; अतः शिवभक्तों पर कामदेव अपने अस्त्र नहीं चला सकता ।

छप्पय ।

अरे काम वेकाम, धनुष टंकारत तर्जत । तू हूँ कोकिल व्यर्थ बोल, काहेको गरजत ॥ तैसे ही तू नारि, वृथा ही करत कटाक्षे । मोहि न उपजे मोह, छोह सब रहिगे पाखै ॥ चित्त चन्द्रचूड़के चरणको, ध्यान अमृत बरषत हिते । आनन्द अखण्डानन्दको, ताहि अमृत सुख क्यों हिते ॥१००॥

100. O Cupid, why dost thou raise thy hand repeatedly to make the sound of thy bow-string audible? O cuckoo, why dost thou prattle in vain uttering forth thy soft and melodious strains? O foolish woman. let alone thy loving and sweet

( ३३५ )

coquetries, as my mind has now drunk the nectar of kissing the feet of Shiva in prayer.

कोपीनं शतखण्डनञ्जरतरं कन्या पुनस्तादृशी

निश्चिन्तं सुखसाध्यैव्ययशनं शय्या रसशाने वने ॥

मिवाभिन् सधानताऽतिदिनला चिन्ताऽथशून्यालये

ध्वस्ता शेषमदममाद मुदितो योगी सुखं तिष्ठति ॥१०१॥

वही योगी सुखी है, जो एकदमसे फटी-पुरानी सैकड़ों चिथड़ोंसे बनी कोपीन पहनता है और वैसी ही गुदड़ी ओढ़ता है, जिसके पास चिन्ता नहीं फटकती, जो सुखसे मिला हुआ भिक्षात्र खाता है, जो रमशान-भूमि या वनमें सो रहता है, जो मित्र और शत्रुओंको समान समझता है, जो सूनी भोंपड़ीमें ध्यान करता है और जिसके मद और प्रमाद सम्पूर्ण रूपसे नष्ट हो गये हैं ॥१०१॥

फटी पुरानी कोपीन पहनने, चिथड़ोंकी गुदड़ी ओढ़ने, निश्चिन्त रहने, सुख से मिले भिक्षात्र के खाने, मरघट या जड़लमें सो रहने, दोस्त और दुश्मन को बराबर समझने और नितान्त सुने घरमें पवित्र ध्यान करनेसे जिसके मद और प्रमाद नाश हो गये हैं, वही योगी संसारमें सुखी है। ऐसे महापुरुषोंको किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं होती। जिसे किसी चीज़की इच्छा नहीं, उसे किसकी गुरुज़? जो मित्र और शत्रु को एक नज़र से देखते हैं, जहाँ जगह पाते हैं वहीं

( ३३६ )

पड़ रहते हैं, जो मिल जाता है वही खा लेते हैं, उन्हें न चिन्ता-राक्षसी सताती है, न उन्हें घमण्ड होता है और न उन्हें मस्ती आती है। वे तो ब्रह्म के ध्यान में मग्न रहते हैं, इसलिये दुःख उनके पास नहीं आता ; वे सदा सुखमें दिन बिताते हैं। जो लोग बहि्या-बहि्या कपड़े पहनते हैं, शाल-दुशाले ओढ़ते हैं, अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट भोजन करते हैं, मखमली गद्दे तकियों पर सोते हैं, किसीको दोस्त और किसीको दुश्मन समझते हैं, ब्रह्मका ध्यान नहीं करते उनको चिन्ता लगी ही रहती है। देखनेमें वे सुखी मालूम होते हैं, पर भीतर-ही-भीतर उनकी आत्मा जला करती है। चिन्ता उनको खोखला कर डालती है। क्योंकि बहि्या-बहि्या भोजन और वस्त्रोंके लिये उन्हें सदा उपाय करने पड़ते हैं, और उनकी रक्षाकी चिन्ता करनी पड़ती है। ऐसोंके ही मित्र और शत्रु होते हैं। जिनका वे भला करते हैं, जिन्हें कुछ सहायता देते हैं अथवा जिन्हें उनसे कुछ मिलने की आशा रहती है, वे मित्र बन जाते हैं ; पर जिनका स्वार्थ साधन नहीं होता, जो उनके ठाठ बाठ और वैभवको फूटी आँखसे नहीं देख सकते, वे उनके नाशकी चेष्टा करते और उनके दुश्मन हो जाते हैं। इसलिये उन्हें रात-दिन शत्रुओंसे बदला लेने और उन्हें पराजित करनेकी फिकके मारे क्षण-भर भी सुखको नींद नहीं आती। अपने वैभव और ऐश्वर्य्यको देखकर उन्हें स्वतः ही अभिमान हो आता है। अभिमानके नशेमें वे अनर्थ करने लगते हैं ; इससे उन्हें सदा भयभीत

( ३३७ )

रहना पड़ता है। बहुत क्या कहें; जिनको आप अमीर देखते हैं, जिनको आप स्त्री-पुत्र धन-रत्न गाड़ी-बोड़े मोटर प्रभृतिसे सुखी देखते हैं, वे वास्तवमें जरा भी सुखी नहीं। सुखी वही है, जिसे किसी चीज़की ज़रूरत नहीं, जिसे किसीसे वर या प्राप्ति नहीं, जिसे ज़रा भी अभिमान नहीं, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, जो कभी चिन्ताको पास नहीं आने देता और जो ब्रह्मानन्दमें ही मग्न रहता है। भला राजा महाराजा और धनी लोग इस सुखको कैसे पा सकते हैं? अगर सुखी होना चाहो, तो संसारको त्याग कर, एकदमसे निश्चिन्त होकर, परमात्माके सिवा किसी भी चीज़की चिन्ता न करो।

जो लोग संसार त्यागें, वह सच्चे मनसे त्यागें; दौग करनेसे कोई लाभ नहीं। आजकल ऐसे बनावटी महात्मा बहुत देखनेमें आते हैं, जो जटा-जूट बढ़ा लेते हैं, स्नाक रमा लेते हैं, आँखें लाल कर लेते हैं, गंगामें पहरों बड़े रहते हैं, शूलोंकी शय्या पर सोते हैं, पर उनकी आशा और तृष्णा नहीं जाती। वे ज़ाहिरा कुछ उठाते हैं, कर्मन्त्रियोंसे उनका काम नहीं लेते; पर मन और ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें नहीं करते, वासनाओंका त्याग नहीं करते, इससे उनका जीवन बुरा जाता है। ऐसे लोगोंके सम्बन्धमें महात्मा कबीर कहते हैं:—

निरवन्धन बंधा रहे, बंध्या निरवन्ध होय । कर्म करे करता नहीं, दास कहाने सोय ॥

२२

इती (२)

एक

( ३२८ )

कृष्ण भगवान् गीताके तीसरे अध्यायके छठे श्लोकमें कहते हैं :—

कर्मैन्द्रियाणि संयम्य य ब्राह्मते मनसा स्मरन् ।

इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

जो मनुष्य कर्मैन्द्रियोंको वशमें करके कुछ काम तो नहीं करता ; किन्तु मनमें इन्द्रियोंके विषयोंका ध्यान किया करता है, वह मनुष्य मूढ़ा और पाखण्डी है ।

मतलब यह है, कि मनुष्यको हाथ, पाँव, मुँह, गुदा और लिङ्गको वशमें कर लेने और इनसे कोई काम न लेनेसे कोई लाभ नहीं ; इनसे तो इनका काम लेना ही चाहिये ; किन्तु आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचाको वशमें करना चाहिये । आँख कान आदि पाँचों ज्ञान-इन्द्रियोंको वशमें करना या अपने-अपने विषयोंसे रोकना ज़रूरी है । बहुतसे लोग, जाहिरमें सिद्ध बननेके लिये, हाथ पाँव प्रभृति कर्मैन्द्रियोंसे काम नहीं लेते, किन्तु मनमें भाँति-भाँतिके इन्द्रिय-विषयोंको इच्छा किया करते हैं । भगवान् कृष्ण ऐसोंको पाखण्डी कहते हैं ।

सबसे अच्छा और सिद्ध पुरुष वही है, जो जाहिरा तो काम करता है, किन्तु अन्दरसे मन और ज्ञानैन्द्रियोंको विषय-वासनासे रोकता है । गीतामें कहा है :—

यत्स्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।

कर्मैन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥

( ३३६ )

हे अर्जुन ! जो मनसे आँख कान नाक आदि इन्द्रियों को वशमें करके और इन्द्रियोंके विषयोंमें मन न लगा कर “कर्म-योग” करता है,—वही श्रेष्ठ है ।

रहीमने यही बात कैसी अच्छी तरह कही है :—

जा “रहीम” मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं ।

जलमें छाया जा परी, काया भीजत नाहिं ॥

तनको योगी सब करें, मनको विरला कैय ।

सहजे सब सिधि पाइये, जा मन योगी होय ॥

मतलब यह है, कि दौंग करनेसे कोई लाभ नहीं । जिनका दिल साफ है, जिनके दिलसे वासनायें निकल गई हैं, उन्हें नहाने धोने प्रभृति विबाध कामों या दूकानदारीकी ज़रूरत नहीं है । रहीम कहते हैं, मन यदि हाथमें है तो मनसा कहीं क्यों न जाय, हानि नहीं ; क्योंकि जलमें शरीरकी परछाईं पड़ने से शरीर नहीं भीजता । लोग शरीरको जोगी करते हैं,—तिलक छापे लगाते हैं, जटाजूट बढ़ाते हैं, नेत्रोंको सुखें करते हैं, भभूत मलते हैं, कोपीन बाँधते हैं ; पर मनको कोई विरलाही जोगी करता है । लोग ऊपरसे योगी बन जाते हैं, पर मन उनका विषय-भोगोंमें लगा रहता है । शरीरसे चाहे जो काम क्यों न किये जायें, पर मनमें विषयोंकी कामना न रहे ; यानी शरीर जोगी न हो, मन जोगी हो जाय ; तो सिद्धि या मोक्ष मिलनेमें सन्देह नहीं । सारांश यह कि, मनके योगी होनेसे ही ईश्वर मिलता है ।

( ३४० )

महाकवि जौक कहते हैं :—

सरापा पाक हैं धोये जिन्होंने हाथ दुनियासे ।

नहीं हाजत कि वह पानी बहयें सरसे पाऊँ तक ॥

जिन्होंने दुनियासे हाथ धो लिये हैं, वे सिरसे पाँव तक शुद्ध हो गये हैं। उन्हें सिरसे पाँव तक पानी बहाकर ज्ञान करनेकी जरूरत नहीं।

मन जब वासना-हीन हो जाता है, तब वह सूखी दिया-सलाईके समान हो जाता है। सूखी दियासलाई जिस तरह भट जल उठती है, पर गीली नहीं जलती; उसी तरह वासना-हीन मन पर परमात्माका रङ्ग जल्दी चढ़ता है; किन्तु वासना-युक्त मन पर हरगिज़ नहीं। इसलिये मनको वासना-हीन करना चाहिये। साथ ही भक्ति भी निष्कास करनी चाहिये। ईश्वरसे मुसाद न माँगनी चाहिये। कामना रख कर भक्ति करनेसे कामना निश्चय ही पूर्ण होती है—ईश्वर भक्तकी इच्छा अवश्य पूरी करता है; पर वैसी भक्तिये परिणाममें भय है; क्योंकि फलोंके भोगनेके लिये जन्मना और मरना पड़ता है। किन्तु जो लोग बिना किसी इच्छाके परमात्माकी भक्ति करते हैं, वे मुक्ति लाभ करते हैं—उन्हें जन्म लेना और मरना नहीं पड़ता।

जब साधकके मनमें कुछ कामना नहीं रहती, तब उसके मनसे ईर्षा-द्वेष और मित्रता-शत्रुता सब दूर हो जाती हैं। वह

( ३४१ )

सब जगत्को एक नज़रसे देखता है। वह मनुष्योंकी आशा नहीं रखता, केवल परमात्माको शरण ले लेता है; इसलिये उसे सहजमें मुक्ति मिल जाती है। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है :—

तव लागि हमते सब बड़े, जब लागि है कुछ चाह ।

चाह-रहित कहको अधिक, पाय परमपद थाह ॥

जब तक मनमें इरा भी आशा रहती है, तभीतक मनुष्य किसीको बड़ा मानता है और किसीका दास बनता है; जब आशा नहीं रहती, तब वह सबको स्वप्न समझता है और सबका आसरा छोड़ एक मात्र परमात्माका आसरा पकड़ता है; इससे उसको, भववन्धनसे छुटकारा मिलकर, परम पदकी प्राप्ति हो जाती है।

क्षपय ।

कथा अरु कोपीन, फटी पुनि महा पुरानी ।

बिना याचना भीख, नींद मरघट मनमानी ॥

रह जग सों निश्चित, फिर जितही मन आवै ।

राखे चितकूँ शान्त, अनुचित नहि भावै ॥

जो रहें लीन यस ब्रह्ममें, सोवत अरु जागत यदा ।

है राज तुच्छ तिहुँ भुवनको, ऐसे पुरुषन कों तदा ॥१०१॥

101. Happy is the recluse who wears a totally worn out loin-cloth, torn into a hundred pieces as well as a covering