भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सकते ; क्योंकि अब मेरे चित्तने शिवके चरण चूमकर अमृत पी लिया है ॥१००॥

जब तब मनुष्यका मन ब्रह्मानन्दका भङ्गा नहीं जानता, जब तक वह परमात्माके चरणोंमें ध्यान लगा कर अमृत नहीं पीता, तभी तक कामदेवका ज़ोर चलता है, तभीतक कोकिला का पञ्चम स्वर उसके दिलमें खलबली पैदा करता है, तभी तक स्त्री के कटाक्ष-वाण उस पर असर करते हैं ; कामारि शिव से प्रीति होने पर ये सब कुछ नहीं कर सकते । भगवान् शिव और कामदेवमें वैर है ; अतः शिवभक्तों पर कामदेव अपने अस्त्र नहीं चला सकता ।

छप्पय ।

अरे काम वेकाम, धनुष टंकारत तर्जत । तू हूँ कोकिल व्यर्थ बोल, काहेको गरजत ॥ तैसे ही तू नारि, वृथा ही करत कटाक्षे । मोहि न उपजे मोह, छोह सब रहिगे पाखै ॥ चित्त चन्द्रचूड़के चरणको, ध्यान अमृत बरषत हिते । आनन्द अखण्डानन्दको, ताहि अमृत सुख क्यों हिते ॥१००॥

100. O Cupid, why dost thou raise thy hand repeatedly to make the sound of thy bow-string audible? O cuckoo, why dost thou prattle in vain uttering forth thy soft and melodious strains? O foolish woman. let alone thy loving and sweet