भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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घास नहीं खाता । कबीरदास कहते हैं, समुद्रकी सीप प्यास- ही-प्यास रटा करती है ; कितनी ही बूँदें क्यों न गिरे, उसे तो स्वातिकी बूँद ही प्यारी लगती है । मेरे गुणनिधान कन्त ! मेरी प्रीति तुझसे है । जो मैं दूसरेसे हँसकर बोल्छूँ तो मेरा काला सुँद हो ।

दोहा ।

नाहिं शिव अरु विष्णुमें, सूर्य अन्तर मोग । तदिप चन्द्रशेखर लखत, प्रीति अधिक कछु होय ॥६६॥

99. Although I see no difference between Shiva, 'the Lord of the universe, and Vishnu the Omnipresent, but my love flows towards the One who bears the new moon on his forehead, i. e., Shiva.

रे कंदर्प करं कर्दर्थयसि किं कोदण्डकारितैः

रेरे कोकिल कोमलैः कलरवैः किं त्वं वृथाजल्पसि ॥

मुग्धे क्षिप्रविदग्धमुग्धमधुरैलोलेः कटाचैरलं

चेतरनुम्बितचन्द्रचूडचरणभ्यानामृतं वर्त्तते ॥१००॥

हे कामदेव ! तू धनुष्यकार सुतानेके लिये क्यों बारबार हाथ उठाता है ? हे कोकिला ! तू मीठी-मीठी सुहावनी आवाज़में क्यों कुड-कुड करती है ? ऐ मूर्खा स्त्री ! तू अपने मनोमोहक मधुर कटाक्ष मुझपर क्यों चलाती है ? अब तुम मेरा कुछ नहीं कर