भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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coquetries, as my mind has now drunk the nectar of kissing the feet of Shiva in prayer.

कोपीनं शतखण्डनञ्जरतरं कन्या पुनस्तादृशी

निश्चिन्तं सुखसाध्यैव्ययशनं शय्या रसशाने वने ॥

मिवाभिन् सधानताऽतिदिनला चिन्ताऽथशून्यालये

ध्वस्ता शेषमदममाद मुदितो योगी सुखं तिष्ठति ॥१०१॥

वही योगी सुखी है, जो एकदमसे फटी-पुरानी सैकड़ों चिथड़ोंसे बनी कोपीन पहनता है और वैसी ही गुदड़ी ओढ़ता है, जिसके पास चिन्ता नहीं फटकती, जो सुखसे मिला हुआ भिक्षात्र खाता है, जो रमशान-भूमि या वनमें सो रहता है, जो मित्र और शत्रुओंको समान समझता है, जो सूनी भोंपड़ीमें ध्यान करता है और जिसके मद और प्रमाद सम्पूर्ण रूपसे नष्ट हो गये हैं ॥१०१॥

फटी पुरानी कोपीन पहनने, चिथड़ोंकी गुदड़ी ओढ़ने, निश्चिन्त रहने, सुख से मिले भिक्षात्र के खाने, मरघट या जड़लमें सो रहने, दोस्त और दुश्मन को बराबर समझने और नितान्त सुने घरमें पवित्र ध्यान करनेसे जिसके मद और प्रमाद नाश हो गये हैं, वही योगी संसारमें सुखी है। ऐसे महापुरुषोंको किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं होती। जिसे किसी चीज़की इच्छा नहीं, उसे किसकी गुरुज़? जो मित्र और शत्रु को एक नज़र से देखते हैं, जहाँ जगह पाते हैं वहीं