वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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पड़ रहते हैं, जो मिल जाता है वही खा लेते हैं, उन्हें न चिन्ता-राक्षसी सताती है, न उन्हें घमण्ड होता है और न उन्हें मस्ती आती है। वे तो ब्रह्म के ध्यान में मग्न रहते हैं, इसलिये दुःख उनके पास नहीं आता ; वे सदा सुखमें दिन बिताते हैं। जो लोग बहि्या-बहि्या कपड़े पहनते हैं, शाल-दुशाले ओढ़ते हैं, अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट भोजन करते हैं, मखमली गद्दे तकियों पर सोते हैं, किसीको दोस्त और किसीको दुश्मन समझते हैं, ब्रह्मका ध्यान नहीं करते उनको चिन्ता लगी ही रहती है। देखनेमें वे सुखी मालूम होते हैं, पर भीतर-ही-भीतर उनकी आत्मा जला करती है। चिन्ता उनको खोखला कर डालती है। क्योंकि बहि्या-बहि्या भोजन और वस्त्रोंके लिये उन्हें सदा उपाय करने पड़ते हैं, और उनकी रक्षाकी चिन्ता करनी पड़ती है। ऐसोंके ही मित्र और शत्रु होते हैं। जिनका वे भला करते हैं, जिन्हें कुछ सहायता देते हैं अथवा जिन्हें उनसे कुछ मिलने की आशा रहती है, वे मित्र बन जाते हैं ; पर जिनका स्वार्थ साधन नहीं होता, जो उनके ठाठ बाठ और वैभवको फूटी आँखसे नहीं देख सकते, वे उनके नाशकी चेष्टा करते और उनके दुश्मन हो जाते हैं। इसलिये उन्हें रात-दिन शत्रुओंसे बदला लेने और उन्हें पराजित करनेकी फिकके मारे क्षण-भर भी सुखको नींद नहीं आती। अपने वैभव और ऐश्वर्य्यको देखकर उन्हें स्वतः ही अभिमान हो आता है। अभिमानके नशेमें वे अनर्थ करने लगते हैं ; इससे उन्हें सदा भयभीत