भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रहना पड़ता है। बहुत क्या कहें; जिनको आप अमीर देखते हैं, जिनको आप स्त्री-पुत्र धन-रत्न गाड़ी-बोड़े मोटर प्रभृतिसे सुखी देखते हैं, वे वास्तवमें जरा भी सुखी नहीं। सुखी वही है, जिसे किसी चीज़की ज़रूरत नहीं, जिसे किसीसे वर या प्राप्ति नहीं, जिसे ज़रा भी अभिमान नहीं, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, जो कभी चिन्ताको पास नहीं आने देता और जो ब्रह्मानन्दमें ही मग्न रहता है। भला राजा महाराजा और धनी लोग इस सुखको कैसे पा सकते हैं? अगर सुखी होना चाहो, तो संसारको त्याग कर, एकदमसे निश्चिन्त होकर, परमात्माके सिवा किसी भी चीज़की चिन्ता न करो।

जो लोग संसार त्यागें, वह सच्चे मनसे त्यागें; दौग करनेसे कोई लाभ नहीं। आजकल ऐसे बनावटी महात्मा बहुत देखनेमें आते हैं, जो जटा-जूट बढ़ा लेते हैं, स्नाक रमा लेते हैं, आँखें लाल कर लेते हैं, गंगामें पहरों बड़े रहते हैं, शूलोंकी शय्या पर सोते हैं, पर उनकी आशा और तृष्णा नहीं जाती। वे ज़ाहिरा कुछ उठाते हैं, कर्मन्त्रियोंसे उनका काम नहीं लेते; पर मन और ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें नहीं करते, वासनाओंका त्याग नहीं करते, इससे उनका जीवन बुरा जाता है। ऐसे लोगोंके सम्बन्धमें महात्मा कबीर कहते हैं:—

निरवन्धन बंधा रहे, बंध्या निरवन्ध होय । कर्म करे करता नहीं, दास कहाने सोय ॥

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इती (२)

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